शुक्रवार, 18 अगस्त 2023
लेख: पत्रकारिता में फोटोग्राफ की प्रासंगिकता
बुधवार, 16 अगस्त 2023
लेख
सतत व समेकित आदिवासी विकास की आवश्यकता
प्रत्येक वर्ष 09 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। आदिवासी कला और संस्कृति की सराहना की जाती है। उत्सव मनाये जाते हैं। साथ ही आदिवासी मुद्दों व विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता है। मेरे विचार से यह दिवस हर्ष मनाने का दिन नहीं है। यह दिन आदिवासी विकास हेतु गंभीर विचार-विमर्श, युक्तियों व सुझावों का दिन होना चाहिए। यह सोचा जाना चाहिए कि साल-दर-साल, दशक-दर-दशक गुजरते जा रहे हैं लेकिन आदिवासी समाज की स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं देखा जा रहा है। इस पर गंभीर चिंतन मनन की जरूरत है।
बात चाहे आदिवासी समुदाय की शिक्षा, रोजगार, मूलभूत सुविधाओं की हो, आर्थिक विकास, सामाजिक-सांस्कृतिक विकास की हो या सुरक्षा की हो, बहुत सारे सवाल एक साथ खड़े हो जाते हैं, जिनका जवाब ढ़ूंढ़ना बहुत मुश्किल लेकिन जरूरी है। इनकी परिस्थितियों को बदलने के प्रयास जिस स्तर पर होने चाहिए थे, नहीं हुए। आजादी के 75 वर्ष बाद भी आदिवासी समाज की स्थिति चिंतनीय है। आदिवास समुदाय विस्थापन, अशिक्षा, बेरोजगारी, असमानता, अंधविश्वास, मूलभूत सुविधाओं की कमी आदि से जूझ रहा है।
प्रशासन की दृष्टि से भी भारतीय संविधान में आदिवासी समाज के विकास हेतु विशेष प्रावधान किये गए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(1) तथा 244(2) में अनुसूचित क्षेत्रों तथा जनजातिय क्षेत्रों के प्रशासन का प्रावधान है। संविधान की पांचवीं अनुसूची में इसका विवरण है। भारत का राष्ट्रपति किसी भी राज्य का कोई क्षेत्र अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकता है। दूसरे शब्दों में यह देश के राष्ट्रपति द्वारा घोषित किसी राज्य का वह भूखण्ड है जहां जनजातियां निवास करती हैं। अनुसूचित क्षेत्र के लिए राज्यों के राज्यपाल यदि चाहें तो सामान्य कानूनों को आदिवासियों पर लागू करते समय परिवर्तन या परिसीमन कर सकते हैं। वे इन घोषित क्षेत्रों में शांति बनाए रखने एवं प्रशासन के भली भांति संचालन के लिए नियम भी बना सकते हैं। ये नियम पंचम अनुसूची में वर्णित भूमि हस्तांतरण को रोकने, भूमि आवंटन करने, व्यापारियों एवं महाजनों की गतिविधियों को नियंत्रित करने आदि के बारे में हो सकते हैं।
आदिवासी विकास में मीडिया की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल लंबे अरसे से आदिवासी क्षेत्र आधुनिक संचार माध्यमों से कटे रहे हैं। इसके दो कारण हैं एक तो आदिवासी समुदाय आधुनिकता के प्रति कोई खास लगाव नहीं होता। वे अपनी जड़ों से जुड़कर परंपराओं के बीच खुश रहते हैं। दूसरा, जिस तरह के प्रयास सरकारों को करने चाहिए थे, नहीं किए। दिशाहीन दौड़ विकास नहीं है। आदिवासियों से सीखें और सिखाएं। हम उनकी संस्कृति को समझते हुए गंभीरता से उन्हें देश-दुनिया का ज्ञान पहुचाएं। आदिवासियों के पास भी ज्ञान का भंडार है। इसका भी उपयोग होना चाहिए।
सतत व समेकित आदिवासी विकास हेतु सरकारंे, स्वयं सेवी संस्थाएं, गैर सरकारी संगठन, मीडिया तो अपना कार्य कर रही हैं। साथ ही आदिवासी विकास हेतु आदिवासी समाज व युवाओं को आगे आना चाहिए। युवाओं से सबसे ज्यादा उम्मीदें होती हैं। वे उम्मीद व ऊर्जा से भरे होते हैं।
-डाॅ. गुरु सरन लाल
मंगलवार, 1 अगस्त 2023
डिजिटल मीडिया के दौर में फोक मीडिया की चुनौतियां
<script asyncsrc="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-7146684394686850"
crossorigin="anonymous"></script>
डिजिटल मीडिया के दौर में फोक मीडिया की चुनौतियां
फोक मीडिया समूह संचार या सामुदायिक संचार का सबसे पुरातन और प्रभावी संचार माध्यम है। फोक मीडिया के माध्यम से छोटे-छोटे समूह में जन जागरुकता संबंधी संदेशों को आसानी से, प्रभावशाली तरीके से पहुंचाया जा सकता है। न सिर्फ समूह संचार बल्कि व्यापक स्तर पर भी इसका असर देखा गया है। फोक मीडिया के अन्तर्गत लोकगीत, लोकसंगीत, लोक नृत्य, नुक्कड़ नाटक, कठपुतली, लोक कथा, लोक गाथा इत्यादि शामिल होते हैं। प्राचीन काल से ही इन कलाओं का समाज में बहुत महत्व रहा है। ये लोगों की रूचियों और परंपराओं में रचे-बसे माध्यम हैं। लोक माध्यमों की लोकप्रियता का वर्णन करते हुए सीन मैकब्राइट ने कहा था कि जन सामान्य के प्रति अपने व्यापक आकर्षण और लाखों निरक्षर लोगों के गहनतम संवेगों को छूने के अपने गुण की दृष्टि से गीत और नाटक का माध्यम अद्वितीय है।
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अन्तर्गत गीत एवं नाटक प्रभाग का कार्य लोक कलाकारों की खोज करना, उन्हें प्रोत्साहन देना और उन्हें मंच प्रदान करना है। फोक मीडिया के कलाकारों को सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। स्पीकमैके जैसी निजी संस्थाएं और सोसाइटी भी अपने स्तर पर लोक कलाओं के प्रचार-प्रसार का कार्य कर रही हैं और कलाकारों को मंच प्रदान किये जा रहे हैं। लोकगीत-संगीत, नुक्कड़ नाटक, कठपुतली नृत्य इत्यादि का प्रदर्शन किया जाता है। सोसाइटी फाॅर प्रमोशन आॅफ इण्डियन कल्चर एमंग यूथ-यह संस्था भी लोक संचार के प्रति लोगों को प्रेरित करती है। जहां कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। यह उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। नशा, मद्यपान, निरक्षरता, अंधविश्वास, सामप्रदायिक वैमनस्य (भेदभाव), कुपोषण जैसी ज्वलंत समस्याओं के निराकरण के लिए लोक माध्यमों का सार्थक उपयोग किया जा रहा है। 1972 के यूनेस्को रिपोर्ट में कहा गया है कि पारंपरिक माध्यम, व्यावहारिक परिवर्तन लाने और निचले स्तर पर विभिन्न समुदायों को समकालीन मुद्दों के प्रति जागरूक करने में जीवंत भूमिका निभाते हैं।
जैसा होता आया है कि नया माध्यम पुराने माध्यम का स्थान लेता है। स्थान न भी लेता हो, तो भी उसे प्रभावित अवश्य करता है। वर्तमान डिजिटल समय में फोक मीडिया और इसके कलाकारों के समक्ष काफी चुनौतियां हैं। डिजिटल मीडिया का अपना आकर्षण है और इसके प्रति लोगों की दीवानगी देखते बनती है। वहीं दूसरी तरफ फोक मीडिया को पुराना माध्यम माना जाता है जबकि इसकी प्रभावशीलता और पहुंच काफी अधिक है। फोक मीडिया संवेदनाओं को उकेरने का कार्य आसानी से करता है। मीडिया मिक्स के इस दौर में फोक मीडिया की अन्तर्वस्तु को आसानी से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफाॅर्म के माध्यम से प्रचारित प्रसारित किया जा सकता है। ब्लाॅग, वेबपोर्टल, यूट्यूब चैनल आदि के माध्यम से फोक मीडिया के कार्यक्रमों या अन्तर्वस्तु को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे सबसे अधिक प्रभावित युवा पीढ़ी होगी।
हम कितने भी डिजिटल हो जाएं लेकिन मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने तथा अपनी जड़ों से जुड़े रखने में फोक मीडिया का कोई मुकाबला नहीं है। भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक इत्यादि आधारों पर समाज के समग्र विकास में लोक माध्यम अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं बशर्ते इस पर पूरा ध्यान दिया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में निवासरत लोगों को जागरूक करने, अनौपचारिक शिक्षा देने, प्रेरित प्रोत्साहि करने में ये माध्यम सस्ते, सुलभ और प्रभावशाली हैं।

