सतत व समेकित आदिवासी विकास की आवश्यकता
प्रत्येक वर्ष 09 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। आदिवासी कला और संस्कृति की सराहना की जाती है। उत्सव मनाये जाते हैं। साथ ही आदिवासी मुद्दों व विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता है। मेरे विचार से यह दिवस हर्ष मनाने का दिन नहीं है। यह दिन आदिवासी विकास हेतु गंभीर विचार-विमर्श, युक्तियों व सुझावों का दिन होना चाहिए। यह सोचा जाना चाहिए कि साल-दर-साल, दशक-दर-दशक गुजरते जा रहे हैं लेकिन आदिवासी समाज की स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं देखा जा रहा है। इस पर गंभीर चिंतन मनन की जरूरत है।
बात चाहे आदिवासी समुदाय की शिक्षा, रोजगार, मूलभूत सुविधाओं की हो, आर्थिक विकास, सामाजिक-सांस्कृतिक विकास की हो या सुरक्षा की हो, बहुत सारे सवाल एक साथ खड़े हो जाते हैं, जिनका जवाब ढ़ूंढ़ना बहुत मुश्किल लेकिन जरूरी है। इनकी परिस्थितियों को बदलने के प्रयास जिस स्तर पर होने चाहिए थे, नहीं हुए। आजादी के 75 वर्ष बाद भी आदिवासी समाज की स्थिति चिंतनीय है। आदिवास समुदाय विस्थापन, अशिक्षा, बेरोजगारी, असमानता, अंधविश्वास, मूलभूत सुविधाओं की कमी आदि से जूझ रहा है।
प्रशासन की दृष्टि से भी भारतीय संविधान में आदिवासी समाज के विकास हेतु विशेष प्रावधान किये गए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(1) तथा 244(2) में अनुसूचित क्षेत्रों तथा जनजातिय क्षेत्रों के प्रशासन का प्रावधान है। संविधान की पांचवीं अनुसूची में इसका विवरण है। भारत का राष्ट्रपति किसी भी राज्य का कोई क्षेत्र अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकता है। दूसरे शब्दों में यह देश के राष्ट्रपति द्वारा घोषित किसी राज्य का वह भूखण्ड है जहां जनजातियां निवास करती हैं। अनुसूचित क्षेत्र के लिए राज्यों के राज्यपाल यदि चाहें तो सामान्य कानूनों को आदिवासियों पर लागू करते समय परिवर्तन या परिसीमन कर सकते हैं। वे इन घोषित क्षेत्रों में शांति बनाए रखने एवं प्रशासन के भली भांति संचालन के लिए नियम भी बना सकते हैं। ये नियम पंचम अनुसूची में वर्णित भूमि हस्तांतरण को रोकने, भूमि आवंटन करने, व्यापारियों एवं महाजनों की गतिविधियों को नियंत्रित करने आदि के बारे में हो सकते हैं।
आदिवासी विकास में मीडिया की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल लंबे अरसे से आदिवासी क्षेत्र आधुनिक संचार माध्यमों से कटे रहे हैं। इसके दो कारण हैं एक तो आदिवासी समुदाय आधुनिकता के प्रति कोई खास लगाव नहीं होता। वे अपनी जड़ों से जुड़कर परंपराओं के बीच खुश रहते हैं। दूसरा, जिस तरह के प्रयास सरकारों को करने चाहिए थे, नहीं किए। दिशाहीन दौड़ विकास नहीं है। आदिवासियों से सीखें और सिखाएं। हम उनकी संस्कृति को समझते हुए गंभीरता से उन्हें देश-दुनिया का ज्ञान पहुचाएं। आदिवासियों के पास भी ज्ञान का भंडार है। इसका भी उपयोग होना चाहिए।
सतत व समेकित आदिवासी विकास हेतु सरकारंे, स्वयं सेवी संस्थाएं, गैर सरकारी संगठन, मीडिया तो अपना कार्य कर रही हैं। साथ ही आदिवासी विकास हेतु आदिवासी समाज व युवाओं को आगे आना चाहिए। युवाओं से सबसे ज्यादा उम्मीदें होती हैं। वे उम्मीद व ऊर्जा से भरे होते हैं।
-डाॅ. गुरु सरन लाल

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