रविवार, 16 अप्रैल 2023

Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 15.04.2023

 Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 15.04.2023



लेख

लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देती नागरिक पत्रकारिता

-डाॅ. गुरु सरन लाल

    किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिक महत्वपूर्ण होते हैं। प्रत्येक नागरिक बराबर होता है और सारे नियम-कायदे सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। भारत में मीडिया या पत्रकारिता को वही वाक् एवं अभिव्यक्ति का अधिकार प्राप्त है जो आम लोगों को है। सूचनाओं या समाचारों के प्रकाशन-प्रसारण और वितरण का अधिकार आम लोगों को भी वही है जो मीडिया को है। एक समय था जब ‘न्यूज-ब्रेक’ करना केवल मुख्यधारा की मीडिया का काम था। आम लोगों को इसका पता तब चलता था जब समाचार प्रकाशित या प्रसारित हो जाते थे। लेकिन न्यू मीडिया या डिजिटल मीडिया के प्रादुर्भाव से नागरिक पत्रकारिता को बल मिला है। अब मुख्यधारा के समानांतर ही एक वैकल्पिक मीडिया कार्य कर रहा है जिसे नागरिक पत्रकारिता कहा जाता है। अब सूचनाएं वैकल्पिक मीडिया द्वारा भी ‘न्यूज-ब्रेक’ की जाती हैं। नागरिक पत्रकारिता कोई नया शब्द नहीं है। समाचार-पत्रों में ‘संपादक के नाम पत्र’ के प्रकाशन से इसकी शुरूआत माना जाता है। 
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की लोकतंत्र की परिभाषा से नागरिक पत्रकारिता को समझा जा सकता है। उनके अनुसार लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए जनता द्वारा शासन है। इसी तरह नागरिक पत्रकारिता, नागरिकों द्वारा नागरिकों के लिए नागरिकों की पत्रकारिता कहा जा सकता है। स्माॅर्टफोन के उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या और इंटरनेट की उपलब्धता ने नागरिक पत्रकारिता को और मजबूत बना दिया है। वेबपोर्टल, ब्लाॅग, यूट्यूब चैनल, सोशल नेटवकिंग साइट्स जैसे ट्वीटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम इत्यादि पर विभिन्न विषयों व मुद्दों से संबंधित लगातार कंटेट उपलब्ध हो रहे हैं। दूरदराज क्षेत्रों की खबरें भी मिल रही हैं जहां आमतौर पर मुख्यधारा की मीडिया की पहुंच नहीं होती। पहुंच होती भी है तो लाभ या विज्ञापन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं होती है। डिजिटल मीडिया ने शिक्षित या अशिक्षित, सामान्य व्यक्ति या दिव्यांग का भेद खत्म कर दिया है क्योंकि इसकी अन्तर्वस्तु लिखे गये शब्दों, फोटोग्राफ, दृश्य-श्रव्य, एनिमेशन, काॅर्टून इत्यादि रूपों में उपलब्ध है जिसे आसानी से समझा जा सकता है। नागरिक पत्रकारिता निचले तबके और हासिए के लोगों की आवाज बनकर उभरा है। 
नागरिक पत्रकारिता या वैकल्पिक मीडिया में समाचारों का फाॅलोअप लगातार होता रहता है। मुख्यधारा की मीडिया समाचारों को प्रकाशित प्रसारित कर फाॅलोअप कम ही लिया जाता है या सभी खबरों पर नहीं लिया जाता। लेकिन नागरिक पत्रकारिता उन मुद्दों व विषयों पर फाॅलोअप उपलब्ध कराया जाता है। विभिन्न नागरिक सुविधाओं से संबंधित समस्याओं को लोग डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया के माध्यम से उठाते हैं और उनका समुचित समाधान भी मिल रहा है। कहीं सड़क धंस गई है या नहीं बन पाई है, नाला, पुलिया, पानी निकासी की समस्या, गली-मोहल्ले में गुंडागर्दी, अराजकतत्व, भ्रष्टाचार, विभिन्न प्रमाण-पत्रों को बनाने में बरती जा रही कोताही इत्यादि न जाने कितने ही मुद्दे हैं जिन्हें नागरिक पत्रकारिता के माध्यम से संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के संज्ञान में लाया जा रहा है और समुचित कार्यवाही भी हो रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है। 
एक ओर जहां नागरिक पत्रकारिता की तमाम खूबियां हैं वहीं इसकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अपूर्ण या अपुष्ट समाचारों या खबरों को भी प्रकाशित प्रसारित कर दिया जाता है। फेक न्यूज की भी चुनौतियां हैं। कभी-कभी अफवाहों, प्रोपेगेण्डा का भी शिकार हो जाता है। इसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहते हैं। किसी भी माध्यम की अपनी खूबियां और खामियां होती हैं। नागरिक पत्रकारिता एक ओर जहां नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति का मंच प्रदान करता है वहीं नागरिकों को भी इसका उपयोग बहुत सावधानी, सतर्कता और समझदारी से करने की जरूरत है।

लेखक का परिचयः 
डाॅ. गुरु सरन लाल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय , भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)

Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 04.04.2023

 Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 04.04.2023



लेख

मीडिया एवं सूचना साक्षरताः आवश्यकता एवं महत्व


मीडिया साक्षरता का अर्थ है मीडिया के विभिन्न रूपों और उसकी अन्तर्वस्तु से परिचित होना। मीडिया की अन्तर्वस्तु के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को पहचानना और समझ के साथ उसका उपयोग करना। वर्तमान सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जब सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। सूचनाओं का प्रबंध एक मुश्किल कार्य हो चला है। ऐसे में फेक न्यू, अफवाह, प्रोपेगेण्डा इत्यादि की पहचान कर सही समाचार व जानकारी को प्राप्त करना एक कला होने के साथ-साथ एक जागरूक नागरिक होने की पहचान है। यह बड़ी जिम्मेदारी है कि फेक न्यूज, बिना तथ्य की सूचनाओं को फैलने से रोका जाए और समाज में सद्भाव, सहचर्य का माहौल बना रहे, ऐसे प्रयास किये जाएं।
मीडिया एवं सूचना साक्षरता के कई प्रकार हैं जैसे- मीडिया लिटरेसी, सूचना लिटरेसी, फिल्म, टेलीविजन, प्रिंट, ऑडियो-विजुअल लिटरेसी, विज्ञापन, इंटरनेट, कल्चरल, फाइनेंशियल लिटरेसी इत्यादि। अर्थात् हमारे जीवन में उपयोग में आने वाले सभी माध्यमों के बारे में सही जानकारी रखना। जब हम समाचार-पत्र या पत्रिका पढ़ें, कोई फिल्म देखें, रेडियो सुनें या टीवी देखें, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर कोई सामग्री देखें तो हम क्या कहा जा रहा है उसे विश्लेषणात्मक तरीके से समझ सकें। ‘रीड बिटवीन द लाइन’ अवधारणा की आज बहुत ज्यादा जरूरत है। यह मीडिया व सूचना साक्षरता से संभव है।
मीडिया व सूचना साक्षरता ऐसी क्षमता है जिसमें हम सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, उनका विश्लेषण, मूल्याकन करते हैं। सही और गलत सूचना व समाचार की समझ विकसित होती है। न्यूज और फेक न्यूज का अन्तर पता चलता है। समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, फिल्में, इंटरनेट, सोशल मीडिया इत्यादि के बारे में एक बेहतर समझ बनती है। एक आलोचनात्मक सोच विकसित होती है। एक तार्किकता की समझ आती है। विभिन्न पाइन्ट ऑफ व्यू को समझने में मदद मिलती है।
मीडिया और सूचना साक्षरता से हम न केवल एक बेहतर पाठक, श्रोता, दर्शक और यूजर बनते हैं बल्कि एक अच्छे उपभोक्ता बनते हैं। उत्पादों के चयन में आसानी होती है। एक वाजिब तर्क होता है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग बेहतर जीवन जीने में कर पाते हैं। साथ ही सतत् विकास के लिए भी मीडिया और सूचना साक्षरता का होना बहुत जरूरी है।
द्वितीय विश्व युद्व के समय प्रोपेगेण्डा शब्द अस्तित्व में आया। उस समय आज की अपेक्षा संचार के माध्यम बहुत कम थे और गति बहुत धीमी थी। आज सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जहां सूचनाओं को मात्र एक क्लिक पर हजारों-लाखों लोगों तक बहुत तीव्र गति से पहुंचाया जा सकता है ऐसे में सूचनाओं के चयन और प्रस्तुतिकरण में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। साथ ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को मीडिया व सूचना साक्षर होना अनिवार्य हो गया है। आज लड़ाई सूचनाओं की है। आज सूचना साम्राज्यवाद का युग है। जिस देश के पास जितनी अधिक सूचनाएं वह उतना ही समृद्ध देश माना जाता है।
संचार शास्त्री मार्शल मैकलुहान ने ‘माध्यम की संदेश है’ की अवधारणा दी थी। उन्होंने टेलीविजन के दर्शकों पर अपना शोध किया और पाया कि लोगों के पास यदि समय है तो वे टेलीविजन देखेंगे। उस समय टीवी पर कौन सा कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है, इससे ज्यादा मतलब नहीं होता। इस अध्ययन के समय टेलीविजन अत्याधुनिक संचार माध्यम था। मार्शल मैकलुहान की अवधारणा वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक है। अत्याधुनिक माध्यम डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। आज जब एक बड़ी ऑडियंस डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया पर शिफ्ट हो रही है, तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया अन्तर्वस्तु भी वहीं पर ज्यादा मिलेगी। ऐसे समय में मीडिया व सूचना साक्षरता का महत्वपूर्ण बढ़ जाता है।
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लेखकः डाॅ. गुरु सरन लाल
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), मोबाइल नं. 9425542795, ई-मेलः gurusaranlal@gmail.com


Article published in Pahat Newspaper on 03.04.2023

 


Article published in Pahat Newspaper on 03.04.2023
लेख

मीडिया एवं सूचना साक्षरताः आवश्यकता एवं महत्व


मीडिया साक्षरता का अर्थ है मीडिया के विभिन्न रूपों और उसकी अन्तर्वस्तु से परिचित होना। मीडिया की अन्तर्वस्तु के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को पहचानना और समझ के साथ उसका उपयोग करना। वर्तमान सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जब सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। सूचनाओं का प्रबंध एक मुश्किल कार्य हो चला है। ऐसे में फेक न्यू, अफवाह, प्रोपेगेण्डा इत्यादि की पहचान कर सही समाचार व जानकारी को प्राप्त करना एक कला होने के साथ-साथ एक जागरूक नागरिक होने की पहचान है। यह बड़ी जिम्मेदारी है कि फेक न्यूज, बिना तथ्य की सूचनाओं को फैलने से रोका जाए और समाज में सद्भाव, सहचर्य का माहौल बना रहे, ऐसे प्रयास किये जाएं।
मीडिया एवं सूचना साक्षरता के कई प्रकार हैं जैसे- मीडिया लिटरेसी, सूचना लिटरेसी, फिल्म, टेलीविजन, प्रिंट, ऑडियो-विजुअल लिटरेसी, विज्ञापन, इंटरनेट, कल्चरल, फाइनेंशियल लिटरेसी इत्यादि। अर्थात् हमारे जीवन में उपयोग में आने वाले सभी माध्यमों के बारे में सही जानकारी रखना। जब हम समाचार-पत्र या पत्रिका पढ़ें, कोई फिल्म देखें, रेडियो सुनें या टीवी देखें, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर कोई सामग्री देखें तो हम क्या कहा जा रहा है उसे विश्लेषणात्मक तरीके से समझ सकें। ‘रीड बिटवीन द लाइन’ अवधारणा की आज बहुत ज्यादा जरूरत है। यह मीडिया व सूचना साक्षरता से संभव है।
मीडिया व सूचना साक्षरता ऐसी क्षमता है जिसमें हम सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, उनका विश्लेषण, मूल्याकन करते हैं। सही और गलत सूचना व समाचार की समझ विकसित होती है। न्यूज और फेक न्यूज का अन्तर पता चलता है। समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, फिल्में, इंटरनेट, सोशल मीडिया इत्यादि के बारे में एक बेहतर समझ बनती है। एक आलोचनात्मक सोच विकसित होती है। एक तार्किकता की समझ आती है। विभिन्न पाइन्ट ऑफ व्यू को समझने में मदद मिलती है।
मीडिया और सूचना साक्षरता से हम न केवल एक बेहतर पाठक, श्रोता, दर्शक और यूजर बनते हैं बल्कि एक अच्छे उपभोक्ता बनते हैं। उत्पादों के चयन में आसानी होती है। एक वाजिब तर्क होता है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग बेहतर जीवन जीने में कर पाते हैं। साथ ही सतत् विकास के लिए भी मीडिया और सूचना साक्षरता का होना बहुत जरूरी है।
द्वितीय विश्व युद्व के समय प्रोपेगेण्डा शब्द अस्तित्व में आया। उस समय आज की अपेक्षा संचार के माध्यम बहुत कम थे और गति बहुत धीमी थी। आज सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जहां सूचनाओं को मात्र एक क्लिक पर हजारों-लाखों लोगों तक बहुत तीव्र गति से पहुंचाया जा सकता है ऐसे में सूचनाओं के चयन और प्रस्तुतिकरण में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। साथ ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को मीडिया व सूचना साक्षर होना अनिवार्य हो गया है। आज लड़ाई सूचनाओं की है। आज सूचना साम्राज्यवाद का युग है। जिस देश के पास जितनी अधिक सूचनाएं वह उतना ही समृद्ध देश माना जाता है।
संचार शास्त्री मार्शल मैकलुहान ने ‘माध्यम की संदेश है’ की अवधारणा दी थी। उन्होंने टेलीविजन के दर्शकों पर अपना शोध किया और पाया कि लोगों के पास यदि समय है तो वे टेलीविजन देखेंगे। उस समय टीवी पर कौन सा कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है, इससे ज्यादा मतलब नहीं होता। इस अध्ययन के समय टेलीविजन अत्याधुनिक संचार माध्यम था। मार्शल मैकलुहान की अवधारणा वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक है। अत्याधुनिक माध्यम डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। आज जब एक बड़ी ऑडियंस डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया पर शिफ्ट हो रही है, तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया अन्तर्वस्तु भी वहीं पर ज्यादा मिलेगी। ऐसे समय में मीडिया व सूचना साक्षरता का महत्वपूर्ण बढ़ जाता है।
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लेखकः डाॅ. गुरु सरन लाल
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), मोबाइल नं. 9425542795, ई-मेलः gurusaranlal@gmail.com

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयंती पर विशेष लेख

लेख

   सामाजिक न्याय और सामाजिक बराबरी के पक्षधर डाॅ. अंबेडकर


भारतरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर आप सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। आज कृतज्ञ राष्ट्र उनकी 132वीं जयंती मना रहा है। बाबा साहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है। बहुत सारे पक्ष हैं, बहुत सारे पहलू हैं। उन्हें हम उच्च कोटि के अर्थशास्त्री, कानूनविद, संविधान निर्माता, ध्येय निष्ठ राजनेता और सामाजिक क्रांति एवं समरसता के अग्रदूत के रूप में जानते हैं। 

    

    महापुरूषों का जीवन अपने आप में आदर्श होता है, अनुकरणीय होता है। बाबा साहब ऐसे महान कर्मयोगी थे जिन्होंने अपनी तपस्या से, अपने बल पर दुनिया में वह मुकाम हासिल किया जो किसी बिरले को हासिल होता है। जिस समय भारतीय संविधान के निर्माण की बात सामने आई तो संविधान सभा का गठन किया गया। पूरी संविधान सभा में बाबा साहब जितना पढ़ा-लिखा कोई नहीं था। दलित समाज के लिए इससे बड़ी गौरव की बात और कोई नहीं थी। जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना। वे सामाजिक न्याय और सामाजिक बराबरी के पक्षधर थे। 

Dr. B.R. Ambedkar
    

बाबासाहब ने अस्पृश्यता का दंश झेला था। यह उन्हें अन्दर से झकझोर दिया था। उस समय का दलित-आदिवासी और पिछड़े समाज पर जो अत्याचार हो रहे थे, जातिवाद, छुआछूत का जो पूरा वातावरण था, वह घुटन वाला था। बाबा साहब ने सभी को समान अधिकार देकर उससे निजात दिलाई। आरक्षण का प्रावधान किया गया जिससे दलित आदिवासी और पिछड़े तबके के लोग आगे आ सकें। हासिए से निकलकर मुख्यधारा में आ सकें। 

उन्होंने एक सूत्र वाक्य दिया- शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। उन्होंने कहा कि जिसे दुखों से मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा, और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा, क्योंकि ज्ञान के बना लड़ने गए तो हार निश्चित है। उनका मानना था कि शिक्षा शेरनी का वह दूध है जिसे पीने वाला दहाड़ने लगता है। उन्होंने संगठित रहकर संघर्ष करने की सीख दी थी। बाबा साहब ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से भारतीय महिलाओं की जिन्दगी को संवार दिया है। उनका उद्धार किया। महिलाओं की दशा सुधारने में मील का पत्थर साबित हुआ। इसका लाभ सभी महिलाओं को मिला चाहे वह किसी भी जाति से आती हों। सभी भारतीय महिलाएं उनकी हमेशा ऋणी रहेंगी। 

बाबा साहेब का पूरा जीवन एक आदर्श के रूप में हमारे सामने है। हमारा कर्तव्य है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलते चले जाएं और उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतारें। 

                                                             -डॉ. गुरु सरन लाल , 9425542795, gurusaranlal@gmail.com

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

पहला सुख निरोगी काया...


विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष                                                                                             07.04.2023

                            पहला सुख निरोगी काया...

जीवन में अच्छे स्वास्थ्य का बहुत महत्व है। यदि हमारे पास दुनिया भर की सारी सुख सुविधाएं हों और हमारा स्वास्थ्य अच्छा ना हो, तो उन सारी सुख सुविधाओं का हम आनंद नहीं ले सकते हैं। उनका कोई मतलब नहीं है। इसलिए कहा गया है कि ‘पहला सुख निरोगी काया’। जब हम स्वस्थ रहते हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। हम अच्छे से अपना कार्य कर पाते हैं। आपने यह कहावत भी सुनी होगी कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। यह बिल्कुल सटीक बात है कि अस्वस्थता की स्थिति में हमारा मस्तिष्क सही से कार्य नहीं करता और मन में नकारात्मक विचार घेरे रहते हैं। वहीं जब हम स्वस्थ रहते हैं तो हमारा मस्तिष्क स्वस्थ रहता है और हम सकारात्मक विचारों से भरे रहते हैं। 

स्वास्थ्य के महत्व को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल से प्रत्येक वर्ष 07 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष 2023 की थीम ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ रखा गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1977 में वर्ष 2000 तक सबको स्वास्थ्य उपलब्ध्ल कराने का संकल्प लिया था। इसके बाद 2000 से 2015 तक मिलेनियम डवलपमेंट गोल के तहत भी प्रयास किये गये और अब 2030 तक सतत विकास के लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं। 

    सन् 1983 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को पारित करके सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पाने का संकल्प लिया था लेकिन राजनीति इच्छाशक्ति के बिना यह संभव नहीं है। जब स्वास्थ्य सुविधाएं कंपनियों की कमाई का जरिया हों तब सबको स्वास्थ्य का सपना कैसे पूरा होगा? यह एक गंभीर विषय है। 

हाल ही में राजस्थान सरकार ने स्वास्थ्य का अधिकार (आर.टी.एच.) लागू किया है। इसके तहत समस्त इलाज निःशुल्क किया जाएगा। यह एक स्वागत योग्य कदम है। बाकी राज्य सरकारों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। 

बहुत सारे आकड़े हैं, बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारे मुद्दे हैं। देखने वाली बात ये है कि आजादी के 75 सालों के बाद भी पूरी जनसंख्या को साफ जल, शुद्ध वायु नहीं मिल पा रही है। अशुद्ध जल और अशुद्ध वायु अनेक संक्रामक बिमारियों के फैलने के मुख्य कारक हैं। बहुत सारी बिमारियां ऐसी भी हैं जो अनियमित, अनियंत्रित जीवन शैली के कारण पैदा हुई हैं। इन्हें हम अपने जीवन शैली को सुधारकर स्वस्थ रखकर इन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, वैज्ञानिक, डाॅक्टर, विशेषज्ञ इत्यादि अपना कार्य बखूबी कर रहे हैं। विज्ञान संचार और स्वास्थ्य संचार के माध्यम से मीडिया भी स्वास्थ्य जागरूकता के प्रति अपनी भूमिका निभा रहा है। इसके साथ ही हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। स्वयं जागरूक होना होगा। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जानकारी विभिन्न बिमारियों से बचा सकती है। कोविड-19 ने पूरे मानव मात्र को और विश्व की स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावित किया है। विश्व पहले से अधिक सतर्क हुआ है। हम निश्चिततौर पर अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क और जागरूक हुए हैं लेकिन यह सतर्कता और जागरूकता लगातार बनी रहनी चाहिए। खुद भी स्वस्थ रहें औरों को भी स्वस्थ रहने में मदद करें। 

लेखक का परिचयः 

डाॅ. गुरु सरन लाल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय , भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), 9131586112


मंगलवार, 21 मार्च 2023

विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

 लेख


                                वन और स्वास्थ्य

        प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य वनों के महत्व को उजागर करना और इसके प्रति लोगों को जागरूक करना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 28 नवंबर, 2012 को एक प्रस्ताव पारित कर प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाए जाने की अनुसंशा की। साथ ही प्रत्येक वर्ष एक थीम निर्धारित की जाती है। इस वर्ष की थीम ‘वन और स्वास्थ्य’ है। अर्थात् वनों का हमारे स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है या हमारे स्वास्थ्य को स्वस्थ रखने में वनों के महत्व को उजागर करना है। 

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वनों से ही मानव जीवन है। वन हमें शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, भोजन व जीवन रक्षक दवाएं, औषधियां, जड़ी बूटियां, उपयोगी फल-फूल इत्यादि प्रदान करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में वनों का बहुत महत्व है। वन कार्बन के प्रमुख स्रोत हैं। वन प्रबंधन वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की समृद्धि और कल्याण में योगदान देते हैं। वन गरीबी उन्मूलन और सतत् विकास लक्ष्यों की उपलब्धि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 


                                                                फोटो स्रोतः गूगल

इन सभी अमूल्य पारिस्थितिक, आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य लाभों के बावजूद वैश्विक वनों की कटाई खतरनाक दर से जारी है। शहरीकरण और आधुनिकीकरण के लिए वनों की कटाई की प्रक्रिया को हतोत्साहित करने का एक प्रयास है। वनों की कटाई से ब्रह्माण्ड की सुन्दरता का नष्ट हुई ही है साथ ही वैश्विक जलवायु परिवर्तनों को असंतुलित किया है। 

वनों के संरक्षण व संवर्धन में वन अनुसंधान संस्थानों, वन अधिकारियों, विभिन्न विश्वविद्यालयों के वानिकी विभागांे, तमाम सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका है। गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की भी सराहना की जानी चाहिए। भारत में 2019 की अपेक्षा वर्तमान में वन क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है। यह सकारात्मक प्रयास है। लेकिन सड़क, हाईवे, बिल्डिंग या दूसरी अधोसंरचना के विकास हेतु वनों की कटाई चिंताजनक है। 

यदि हमने केवल वनों को बचा लिया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सतत विकास की राह और आसान हो जाएगी। साथ ही सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में आसानी होगी। 

             -डाॅ. गुरु सरन लाल


सोमवार, 13 फ़रवरी 2023

विश्व रेडियो दिवस पर विशेष


रेडियो एक लोकप्रिय जनमाध्यम   

                  

        प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। इसक उद्देश्य दैनिक जीवन में संचार के शक्तिशाली माध्यम रेडियो के योगदान को याद करना है। इस वर्ष की थीम रेडियो और शांति है। विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, रेडियो दुनिया में सबसे विश्वसनीय और उपयोग किए जाने वाले मीडिया में से एक बना हुआ है। विश्व रेडियो दिवस 2023 पर, यूनेस्को ने स्वतंत्र रेडियो को युद्ध/संघर्ष की रोकथाम और शांति निर्माण के लिए एक स्तंभ के रूप में उजागर किया है। 


Painting: My daughter Aashvi Saran Gautam

        वर्तमान दौर में जनसंचार माध्यमों की भूमिका लोगों को सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करने तक ही सीमित नहीं है। वर्तमान वैश्विकरण के दौर में जनसंचार माध्यमों की भूमिका बढ़ी है। लोगों को जागरूक करने, प्रेरित, प्रोत्साहित करने, सामाजिक चेतना के विकास में जनसंचार माध्यमों की महती भूमिका है। रेडियो एक सस्ता व लोकप्रिय जनमाध्यम है। भारत में रेडियो के प्रसारण की शुरूआत भले ही मनोरंजन के उद्देश्य से रेडियो क्लबों द्वारा की गई, लेकिन समय के साथ-साथ रेडियो जनसंचार का एक महत्वपूर्ण और प्रभावी माध्यम बन गया है। रेडियो समाचार, समसामयिक विषयों पर  चर्चा-परिचर्चा, साक्षात्कार, रेडियो फीचर इत्यादि के माध्यम से रेडियो पत्रकारिता को बल मिला है। मनोरंजन के लिए गीत-संगीत के कलेवर में लिपटे हुए रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है। रेडियो की अन्तर्वस्तु लोक कल्याणकारी होती है। लोगों को एकता के सूत्र में बांधता रेडियो देश की विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। भारत की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में निवास करती है। इन क्षेत्रों में रेडियो माध्यम सूचना का महत्वपूर्ण स्रोत है। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद रेडियो माध्यम को सरकार की नितियों और योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। साथ ही बच्चों, महिलाओं, किसानों, जवानों के लिए कार्यक्रमों का प्रसारण किया गया। समय-समय पर गठित विभिन्न समितियों की अनुशंसाओं के आधार पर रेडियो की अन्तर्वस्तु एवं इसके प्रसारण में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिलते हैं। 

रेडियो प्रसारण की दृष्टि से इसे तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है-आकाशवाणी, एफएम रेडियो एवं सामुदायिक रेडियो। आकाशवाणी के कार्यक्रमों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- समाचार, संगीत तथा उच्चरित शब्द। एफएम के प्रसारण में सूचना और मनोरंजन का समन्वय किया गया है। इसके प्रसारण समय का 30 प्रतिशत समाचार तथा सामयिक कार्यक्रमों के लिए और 70 प्रतिशत मनोरंजन आधारित कार्यक्रमों के लिए है। सामुदायिक रेडियो, रेडियो का नया रुपान्तरण है। इसके माध्यम से अलग-अलग समुदाय के लोगों को सूचना, शिक्षा, जागरुकता, प्रेरणा आदि प्रदान करने का कार्य किया जाता है। इसके कार्यक्रम उस समुदाय की जरुरतों, समस्याओं और आवश्यकताओं के अनुरुप होते हैं। इसके माध्यम से धीरे-धीरे लोगों को विकास की मुख्य धारा में लाने का एक सफल प्रयास किया जा रहा है। 

एक तरफ जहां रेडियो माध्यम पर लोकसंगीत, लोक संस्कृति और भाषा को बनाए रखने की चुनौतियां हैं वहीं दूसरी तरफ नये माध्यम के दौर में अपनी प्रासंगिकता को भी बनाए रखने की चुनौती है। उम्मीद की जा सकती है कि उक्त चुनौतियों से निपटते हुए रेडियो विश्व में शांति स्थापित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभायेगा।

                                                            -डॉ. गुरु सरन लाल