मंगलवार, 21 मार्च 2023

विश्व वानिकी दिवस पर विशेष

 लेख


                                वन और स्वास्थ्य

        प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य वनों के महत्व को उजागर करना और इसके प्रति लोगों को जागरूक करना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 28 नवंबर, 2012 को एक प्रस्ताव पारित कर प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस मनाए जाने की अनुसंशा की। साथ ही प्रत्येक वर्ष एक थीम निर्धारित की जाती है। इस वर्ष की थीम ‘वन और स्वास्थ्य’ है। अर्थात् वनों का हमारे स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है या हमारे स्वास्थ्य को स्वस्थ रखने में वनों के महत्व को उजागर करना है। 

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वनों से ही मानव जीवन है। वन हमें शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, भोजन व जीवन रक्षक दवाएं, औषधियां, जड़ी बूटियां, उपयोगी फल-फूल इत्यादि प्रदान करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में वनों का बहुत महत्व है। वन कार्बन के प्रमुख स्रोत हैं। वन प्रबंधन वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की समृद्धि और कल्याण में योगदान देते हैं। वन गरीबी उन्मूलन और सतत् विकास लक्ष्यों की उपलब्धि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 


                                                                फोटो स्रोतः गूगल

इन सभी अमूल्य पारिस्थितिक, आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य लाभों के बावजूद वैश्विक वनों की कटाई खतरनाक दर से जारी है। शहरीकरण और आधुनिकीकरण के लिए वनों की कटाई की प्रक्रिया को हतोत्साहित करने का एक प्रयास है। वनों की कटाई से ब्रह्माण्ड की सुन्दरता का नष्ट हुई ही है साथ ही वैश्विक जलवायु परिवर्तनों को असंतुलित किया है। 

वनों के संरक्षण व संवर्धन में वन अनुसंधान संस्थानों, वन अधिकारियों, विभिन्न विश्वविद्यालयों के वानिकी विभागांे, तमाम सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका है। गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की भी सराहना की जानी चाहिए। भारत में 2019 की अपेक्षा वर्तमान में वन क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है। यह सकारात्मक प्रयास है। लेकिन सड़क, हाईवे, बिल्डिंग या दूसरी अधोसंरचना के विकास हेतु वनों की कटाई चिंताजनक है। 

यदि हमने केवल वनों को बचा लिया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सतत विकास की राह और आसान हो जाएगी। साथ ही सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में आसानी होगी। 

             -डाॅ. गुरु सरन लाल


सोमवार, 13 फ़रवरी 2023

विश्व रेडियो दिवस पर विशेष


रेडियो एक लोकप्रिय जनमाध्यम   

                  

        प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। इसक उद्देश्य दैनिक जीवन में संचार के शक्तिशाली माध्यम रेडियो के योगदान को याद करना है। इस वर्ष की थीम रेडियो और शांति है। विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, रेडियो दुनिया में सबसे विश्वसनीय और उपयोग किए जाने वाले मीडिया में से एक बना हुआ है। विश्व रेडियो दिवस 2023 पर, यूनेस्को ने स्वतंत्र रेडियो को युद्ध/संघर्ष की रोकथाम और शांति निर्माण के लिए एक स्तंभ के रूप में उजागर किया है। 


Painting: My daughter Aashvi Saran Gautam

        वर्तमान दौर में जनसंचार माध्यमों की भूमिका लोगों को सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करने तक ही सीमित नहीं है। वर्तमान वैश्विकरण के दौर में जनसंचार माध्यमों की भूमिका बढ़ी है। लोगों को जागरूक करने, प्रेरित, प्रोत्साहित करने, सामाजिक चेतना के विकास में जनसंचार माध्यमों की महती भूमिका है। रेडियो एक सस्ता व लोकप्रिय जनमाध्यम है। भारत में रेडियो के प्रसारण की शुरूआत भले ही मनोरंजन के उद्देश्य से रेडियो क्लबों द्वारा की गई, लेकिन समय के साथ-साथ रेडियो जनसंचार का एक महत्वपूर्ण और प्रभावी माध्यम बन गया है। रेडियो समाचार, समसामयिक विषयों पर  चर्चा-परिचर्चा, साक्षात्कार, रेडियो फीचर इत्यादि के माध्यम से रेडियो पत्रकारिता को बल मिला है। मनोरंजन के लिए गीत-संगीत के कलेवर में लिपटे हुए रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है। रेडियो की अन्तर्वस्तु लोक कल्याणकारी होती है। लोगों को एकता के सूत्र में बांधता रेडियो देश की विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। भारत की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में निवास करती है। इन क्षेत्रों में रेडियो माध्यम सूचना का महत्वपूर्ण स्रोत है। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद रेडियो माध्यम को सरकार की नितियों और योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। साथ ही बच्चों, महिलाओं, किसानों, जवानों के लिए कार्यक्रमों का प्रसारण किया गया। समय-समय पर गठित विभिन्न समितियों की अनुशंसाओं के आधार पर रेडियो की अन्तर्वस्तु एवं इसके प्रसारण में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिलते हैं। 

रेडियो प्रसारण की दृष्टि से इसे तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है-आकाशवाणी, एफएम रेडियो एवं सामुदायिक रेडियो। आकाशवाणी के कार्यक्रमों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- समाचार, संगीत तथा उच्चरित शब्द। एफएम के प्रसारण में सूचना और मनोरंजन का समन्वय किया गया है। इसके प्रसारण समय का 30 प्रतिशत समाचार तथा सामयिक कार्यक्रमों के लिए और 70 प्रतिशत मनोरंजन आधारित कार्यक्रमों के लिए है। सामुदायिक रेडियो, रेडियो का नया रुपान्तरण है। इसके माध्यम से अलग-अलग समुदाय के लोगों को सूचना, शिक्षा, जागरुकता, प्रेरणा आदि प्रदान करने का कार्य किया जाता है। इसके कार्यक्रम उस समुदाय की जरुरतों, समस्याओं और आवश्यकताओं के अनुरुप होते हैं। इसके माध्यम से धीरे-धीरे लोगों को विकास की मुख्य धारा में लाने का एक सफल प्रयास किया जा रहा है। 

एक तरफ जहां रेडियो माध्यम पर लोकसंगीत, लोक संस्कृति और भाषा को बनाए रखने की चुनौतियां हैं वहीं दूसरी तरफ नये माध्यम के दौर में अपनी प्रासंगिकता को भी बनाए रखने की चुनौती है। उम्मीद की जा सकती है कि उक्त चुनौतियों से निपटते हुए रेडियो विश्व में शांति स्थापित करने में अपनी भूमिका बखूबी निभायेगा।

                                                            -डॉ. गुरु सरन लाल

मंगलवार, 27 सितंबर 2022

विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष आलेख

 

 

विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष आलेख


ख़्वाजा मीर दर्द का एक शेर् है -

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ

 

जब बात कहीं घूमने जाने या सैर-सपाटे की हो तो यानायास ही ये शेर याद आ जाता है. आप विश्व पर्यटन दिवस है और ऐसे मौके पर ये शेर याद आना लाजिमी है.

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पूरी दुनिया में प्रत्येक वर्ष 27 सितम्बर को विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 1980 से हुई.

वर्ष 2022 की थीम है – रीथिन्किग टूरिज्म अर्थात् पर्यटन पर पुनर्विचार. विगत लगभग तीन वर्षों से कोविड -19 के प्रकोप से पूरी दुनिया जूझ रही है. इससे सभी क्षेत्र प्रभावित हुए हैं. पर्यटन तो बहुत प्रभावित हुआ है. अभी भी लोगों में इतना डर है कि लोग आसानी से पहले की तरह पर्यटन के बारे में नहीं सोच रहे हैं. शायद इसीलिए इस बर्ष इस थीम का चयन किया गया. ताकि लोग पर्यटन के बारे में फिर से विचार कर सकें. इससे न सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि जो लोग पर्यटन उद्योग से जुड़े हुए हैं उनको रोजगार प्राप्त हो सकेगा. तो अगर आपके पास वक़्त है तो निकल पड़िए कहीं घूमने.

पर्यटन पर निकलने से पहले:

पर्यटन पर निकलने से पहले पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए. जिस जगह जा रहे हैं वहां के मौसम अनुसार कपड़े साथ रखना चाहिए. पैसे कैश के रूप में रखने के बजाय एटीएम कार्ड रखना ज्यादा सुरक्षित होगा. आने-जाने का टिकट भी पहले से बुक कर लें. अपने साथ सीमित और आवश्यक सामान ही रखें. याद रखें- जितना कम सामान रहेगा , उतना सफ़र आसान रहेगा.


                 फोटो क्रेडिट: गूगल

घूमने कहाँ जायें-

    जिसकी जितनी व्यवस्था हो वह अपनी सुविधानुसार पर्यटन का निर्णय ले सकता है. अपना देश भारत तमाम विविधताओं से भरा हुआ है. इसकी सांस्कृतिक विविधता को देखना अपने आप में रोमांचक है. इसलिए अपनी पसंद का कोई स्थान चयन कीजिये और घूम आइये. यकीन मानिये आप पहले से ज्यादा तरोताजा महसूस करेंगे.

पर्यटन से लाभ:


    पर्यटन के बहुत लाभ हैं. इससे दिलोदिमाग ताज़ा होता है. बोझिल जिंदगी के लम्पट थपेड़ों से थोड़ी राहत मिलती है. भागदौड़ भरी जिंदगी में जितना मौका मिले घूमने जरूर जायें. जब आप पर्यटन करते हैं तो घूमने के साथ-साथ आपको बहुत सारी जानकारियां प्राप्त हो जाती हैं.

    तो फिर देर किस बात की. उठाइए अपना  बैग 
और घूम आइये अपनी किसी मन पसंद जगह पर...

 

                                             -डॉ. गुरु सरन लाल

रविवार, 18 सितंबर 2022

आजादी के 75 वर्ष और मीडिया

  लेख

आजादी के 75 वर्ष और मीडिया


विगत 15 अगस्त 2022 को भारत देश की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो गए हैं। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के अन्तर्गत पूरे वर्ष भर बड़ी धूमधाम से विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। आजादी के इन 75 वर्षों में भारत में बहुत परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। परिवर्तन सभी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। मीडिया के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहे हैं। लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में मीडिया की जिम्मेदारी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से कम नहीं है। स्वतंत्रता पूर्व मीडिया एक मिशन था, लेकिन स्वतंत्रता उपरांत यह प्रोफेशन में बदल गया है। बदलाव जरूरी भी है। मीडिया के रूप, स्वरूप, कंटेंट, प्रस्तुतिकरण, फीडबैक मेकेनिज्म, ऑडियंस सर्वे इत्यादि में अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहे हैं। समय के साथ जहां पुराने मध्यमों का प्रभाव कम हुआ है और अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है वहीं नए माध्यमों का प्रादुर्भाव भी हुआ है। इंटरनेट के आविष्कार के उपरांत अस्तित्व में आये ‘न्यू मीडिया’ या डिजिटल मीडिया ने बहुत कम समय में लोगों के दिलों में जगह बना ली है। संचारविद मार्शल मैकलुहान के ग्लोबल विलेज की अवधारणा को साकार करता हुआ न्यू मीडिया बहुत प्रचलित हो गया है और प्रभावी भी। सूचनाओं का बहुत कम समय में बल्कि कहा जाए कि रियल टाइम में अधिक से अधिक लोगों तक सम्प्रेषित करना संभव हो गया है। 

पिछले 75 वर्षों में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और फोक मीडिया की अंतर्वस्तु, प्रस्तुति, प्रभाव में परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। एक ओर जहां प्रिंट मीडिया में बेहतर डिजाइन एवं कलर के साथ समाचार सामग्रियां प्रस्तुत की जा रही हैं वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया की अन्तर्वस्तु की प्रस्तुति नये कलेवर व नए कान्सेप्ट के साथ की जा रही है। ये अन्तर्वस्तु लोगों की रूचि व आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। हालांकि सभी माध्यमों के लिए यह कहना उचित नहीं होगा।  

विज्ञापन और जनसंपर्क के क्षेत्र में आए बदलावों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि इंटरनेट आधारित अन्तर्वस्तु बढ़ी है। ऑनलाइन विज्ञापन या ई-विज्ञापनों में बेतहासा वृद्धि हुई है। टेक्ट्स, पिक्चर, ऑडियो-विजुअल से सजे हुए ऑनलाइन विज्ञापन लगभग सभी वेबसाइट, वेबपोर्टल, सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहे हैं। इससे एक तरफ जहां लोगों को प्रोडक्ट, सर्विस या आइडिया के बारे में पता चलता है वहीं ये विज्ञापन वेबसाइट या वेबपोर्टल की आय के साधन भी होते हैं। किसी प्रोडक्ट, सर्विस या आइडिया के बारे में ऑनलाइन सर्वे भी संचालित किये जा रहे हैं। जनसंपर्क के क्षेत्र में नये-नये पीआर टूल्स का उपयोग होने लगा है। सोशल मीडिया का भी उपयोग होने लगा है।

मनोरंजन जगत में ओटीटी प्लेटफाॅर्म एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ओटीटी पर वेब सीरीज, फिल्में, धारावाहिक, कार्टून फिल्में इत्यादि सामग्रियां उपलब्ध हैं। लोग अपने स्मार्टफोन या टीवी पर इन सामग्रियों का आनंद ले रहे हैं। 


वर्तमान समय में सोशल मीडिया व डिजिटल मीडिया से नागरिक पत्रकारिता को बढ़ावा मिला है। साथ ही आम लोग भी समाचार सामग्रियों, समसामयिक विषयों व घटनाओं पर अपनी राय रख रहे हैं। खबरों का फाॅलोअप भी बढ़ा है। जिन मुद्दों व विषयों को मुख्यधारा की मीडिया नजरअंदाज करती है या कवरेज नहीं करती उन पर भी सोशल मीडिया के माध्यम से लोग अपनी बात रखते हैं। 


लेखकः डाॅ. गुरु सरन लाल



गुरुवार, 15 सितंबर 2022

अभियंता दिवस पर विशेष

 देश व समाज को और अधिक सुविधायुक्त बनाने, जीवन को सरल-सुगम बनाने और


सतत विकास की अवधारणा को साकार करने में एक इंजीनियर की बहुत बड़ी भूमिका होती है। स्मार्ट फोन, एटीएम, मेट्रो ट्रेन, अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त बस इत्यादि न जाने कितने ही निर्माण/आविष्कार इंजीनियरों द्वारा किया गया है।

आज अभियंता दिवस पर डॉ. एम. विश्वेश्वरैया की स्मृति को सादर नमन।

अपनी कल्पना से एक इंजीनियर की पेंटिंग बनाई है प्यारी बेटी एंजल ने।

लोकतंत्र को सशक्त बनाने में मीडिया की भूमिका

अन्तरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस पर विशेष आज अन्तरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है। वर्ष 2008 से प्रत्येक वर्ष यह दिवस 15 सितम्बर को मनाया जाता है। वर्ष 2022 की थीम है- लोकतंत्र, शांति और सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मीडिया की स्वतंत्रता का महत्व मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र में मीडिया का महत्पवूर्ण स्थान है। मीडिया लोकतंत्र की सभी स्थितियों व प्रक्रियाओं में एक सजग प्रहरी की तरह वाॅच डाग का कार्य करती है। चुनाव या मतदान, सरकार का गठन, लोकसभा, राज्यसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की कार्यवाही और लिये गए निर्णय को जन जन तक पहुंचाने का कार्य मीडिया करती है। सभी प्रक्रियाओं व स्थितियों की समस्त जानकारियां मीडिया द्वारा लोगों को प्रदान की जाती हैं। चुनाव के दौरान अधिसूचना जारी होते ही विभिन्न मुद्दों और विषयों पर पब्लिक ओपिनियन बनाने का कार्य मीडिया करता है। महान संचारविद् मैक्सवेल मैककाॅम और डोनाल्ड एल शाॅ ने मीडिया का एजेंडा सेटिंग सिद्धान्त दिया है। इस सिद्धान्त के अनुसार मीडिया को इससे कुछ ज्यादा मतलब नहीं होता कि लोग क्या सोचते हैं, बल्कि मीडिया यह जानना चाहता है कि उसने जो एजेंडा तय किया है उसके बारे में लोग क्या सोचते हैं। यह बात चुनावों के दौरान मीडिया में देखी जा सकती है। हालांकि यह सिद्धान्त 1972 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के परिणामों पर आधारित था लेकिन यह अन्य देशों के लिए भी उतना ही सही है। मतदान उपरान्त सरकार के गठन की पूरी प्रक्रिया की जानकारी भी मीडिया प्रस्तुत करता है। सरकार गठन के उपरांत यदि सत्तारूढ़ पार्टी अपने चुनावी घोषणा-पत्र में दिए गए वादों को पूरा नहीं करती है तो मीडिया सवाल उठाता है। इसी तरह लोकसभा, राज्यसभा व विधानसभाओं के विभिन्न सत्रों की कार्यवाही की पूरी जानकारी व समीक्षा मीडिया प्रस्तुत करता है। किसी विवाद की स्थिति में भी मीडिया निष्पक्ष होकर अपनी राय व्यक्त करता है। सभी पहलुओं से रिपोर्टिंग करता है। एक सशक्त लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि वहां मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष हो। जब मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होगी तो सूचना का समान प्रवाह सुनिश्चित हो पाता है। तानाशाही या गैर-लोकतांत्रित देशों मंे सबसे पहले मीडिया पर लगाम कसा जाता है। क्योंकि मीडिया अगर नियंत्रण में रहेगी तो वे मनचाहे निर्णय ले पाएंगे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान प्रेस पर नियंत्रण करने के लिए अंग्रेजी हूकूमत ने गैंगिंग एक्ट लागू किया। इसके बाद न जाने कितने अखबारों पर छापा मारकर उसे बंद कर दिया गया। पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। इसका एक उद्देश्य था कि सूचनाओं के प्रवाह को रोकना। वर्तमान सूचनाक्रांति के युग में किसी देश के शक्तिशाली होने का पैमाना यह नहीं रह गया है कि उसके पास कितने हथियार हैं या कितनी बड़ी सेना है। बल्कि उसके पास कितनी अधिक सूचनाएं हैं, इससे कोई देश शक्तिशाली कहा जा रहा है। इसलिए मीडिया की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि सूचनाएं समान रूप से सभी को उपलब्ध हों। यह एक सशक्त लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण शर्त होनी चाहिए। प्रेस के चार सिद्धान्तों में लोकतांत्रिक सहभागिता का सिद्धान्त भी है। इसमें कहा गया है कि मीडिया का कार्य लोगों को सिर्फ सूचना शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करना नहीं है बल्कि लोकतंत्र को बनाए रखने व इसे मजबूत बनाने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देना है। लोकतंत्र को बनाए रखने और इसे और मजबूत बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब तक मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष है, तब तक यह विश्वास किया जा सकता है कि लोकतंत्र पर कोई आंच नहीं आने पाएगी। .............................................. लेखक-डाॅ. गुरु सरन लाल, सह-प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचाार विभाग, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

08 सितम्बर : विश्व साक्षरता दिवस पर विशेष

संपूर्ण साक्षरता की राहें आसान नहीं प्रत्येक वर्ष 08 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को ने 1965 में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का निर्णय लिया था और 08 सितंबर 1966 से यह दिवस प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। भारत में वर्ष 2002 में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया। इसके बाद शिक्षा के अधिकार अधिनियम के माध्यम से 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दिया गया। साक्षर की परिभाषा के अनुसार सात साल या इससे ऊपर का व्यक्ति जो किसी भी भाषा में पढ़ लिख सकता है, वह साक्षर है। लेकिन वह व्यक्ति जो केवल पढ़ सकता है लेकिन लिख नहीं सकता, वह साक्षर नहीं है। 1991 की जनगणना से पहले यह यह आयु पांच वर्ष थी।
आंकड़ों की बात करें तो 2011 में भारत की जनगणना दर जहां 74.4 प्रतिशत थी वहीं नेशनल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 2022 में साक्षरता दर 77.7 प्रतिशत है। यह रफ्तार बहुत धीमी है। ज्ञातव्य हो कि संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास के 17 लक्ष्यों में शिक्षा को भी शामिल किया है और यह लक्ष्य 2030 तक पूरा करना है। यह बहुत बड़ा लक्ष्य है। शिक्षा को संवर्ती सूची में रखा गया है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस विषय पर कानून बनाने का अधिकार है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, सूचना का अधिकार अधिनियम और केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम प्रयासों के बाद भी संपूर्ण साक्षरता का सपना हाल फिलहाल साकार होता नहीं दिख रहा है। इस पथ में आर्थिक पिछड़ापन,संसाधनों की कमी, बाल मजदूरी, राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी सहित सामाजिक, भौगोलिक आदि प्रमुख बाधाएं हैं. हम सभी को मिलजुलकर प्रयास करने होंगे. लेखक: डॉ.गुरु सरन लाल, एसोसिएट प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़)