सोमवार, 24 अप्रैल 2023

Article on Public Relations day published in Bharat Bhaskar 22.04.2023

 

लेख


*जनसंपर्क के क्षेत्र में नई प्रवृत्तियां*

प्रत्येक वर्ष 21 अप्रैल को राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस मनाया जाता है। पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया (पी.आर.एस.आई.) द्वारा 1986 में यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष 21 अप्रैल को राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस मनाया जाएगा। पीआरएसआई, जनसंपर्क प्रैक्टिशनर्स का एक राष्ट्रीय संघ है जिसकी स्थापना 1958 में जनसंपर्क को एक पेशे के रूप में मान्यता को बढ़ावा देने और एक रणनीतिक प्रबंधन कार्य के रूप में जनसंपर्क के उद्देश्यों और संभावनाओं को विस्तार देने के लिए की गई थी। वर्ष 2023 की थीम ‘जी-20 और भारतीय मूल्यः जनसंपर्क परिप्रेक्ष्य’ रखा गया है। 
जनसंपर्क एक प्रबंधकीय कार्य है। जनसंपर्क मूलरूप से पत्रकारिता एवं जनसंचार का एक स्वरूप है, जिसके माध्यम से किसी संस्थान या व्यक्ति की छवि निर्माण करने, मीडिया रिलेशन बनाने जैसे कार्य किये जाते हैं। जनसंपर्क के प्रकारों की बात की जाए तो केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के जनसंपर्क, कार्पोरेट जनसंपर्क, राजनीतिक जनसंपर्क, व्यक्तिगत जनसंपर्क, निजी संस्थानों के जनसंपर्क इत्यादि आते हैं। 
शुरूआत में जनसंपर्क का क्षेत्र प्रेस-विज्ञप्ति तैयार करने, प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करने, हाऊस जर्नल प्रकाशित करने तक सीमित था लेकिन वर्तमान में जनसंपर्क के रूप और स्वरूप में बहुत बदलाव देखने को मिलते हैं। ये बदलाव मीडिया के रूपों में आए बदलाव के कारण भी है। वर्तमान में जनसंपर्क के अन्तर्गत प्रेस-विज्ञप्ति तैयार करना, प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करना, स्वस्थ मीडिया रिलेशन बनाना, प्रेस विजिट आयोजित करना, विज्ञापन जारी करना इत्यादि कार्य के साथ ही विभिन्न डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी लगातार जुड़े रहना व अपडेट देना भी जनसंपर्क का कार्य है। आंतरिक व बाह्य पब्लिक से लगातार संपर्क व संवाद बनाए रखना। डैमेज कंट्रोल व विपदा नियंत्रण करने हेतु भी जनसंपर्क का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में एक जनसंपर्क अधिकारी की भूमिका व कार्यक्षेत्र बढ़ गया है। उसे एक साथ पत्रकार और संचारक दोनों ही भूमिकाएं निभानी पड़ रही हैं। 
विभिन्न संस्थान या विभाग का अपना ट्विटर हैंडल, यूट्यूब चैनल, फेसबुक एकाउंट व फेसबुक पेज, इंस्टाग्राम पर एकाउंट, वेबपोर्टल, वेबसाइट इत्यादि प्लेटफाॅर्म हैं, जहां सभी सूचनाएं अद्यतन मिल जाती हैं। जनसंपर्क विभाग लगातार इन सूचनाओं को अपडेट करता है। प्रेस-विज्ञप्ति, सूचना, बैठक सूचना इत्यादि की जानकारियां आसानी से मिल जाती हैं। 
वर्तमान सूचना और प्रौद्योगिकी के दौर में जब झूठी व निराधार सूचनाएं, अफवाहें, प्रोपेगेण्डा आसानी से फैलाये जाने की संभावना अधिक है, ऐसे में इसे रोकने में जनसंपर्क विभाग की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। किसी भी ऐसी स्थिति से निपटने की जिम्मेदारी भी जनसंपर्क अधिकारी व जनसंपर्क विभाग की है कि समय रहते सत्य को लोगों तक पहुंचाया जाए। नहीं तो संस्थान की छवि को नुकसान हो सकता है। ब्रांड इमेज आसानी से नहीं बनती। क्राइसिस मैनेजमेंट का कार्य भी जनसंपर्क विभाग द्वारा किया जाता है। यदि एक बार छवि खराब हो जाए तो सालों लग जाते हैं इसे बनाने में। वैसे क्राइसिस कम्युनिकेशन, संचार के एक नए क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहा है जिस पर अध्ययन और शोध जारी है। 
बदलते दौर में जनसंपर्क का दायरा बढ़ा है। इसके स्वरूप में भी परिवर्तन आए हैं। एक बेहतर जनसंपर्क के लिए जरूरी है कि वह समय के साथ-साथ अपने में बदलाव लाए। नई-नई सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के अनुरूप अपनी अन्तर्वस्तु का निर्माण, चयन व उसका प्रचार-प्रसार करे। फेक न्यूज से जूझते हुए सत्य बात को लोगों तक पहुंचाना व उन्हें विश्वास में लेना सबसे बड़ी चुनौति है।

रविवार, 23 अप्रैल 2023

किताबों की दुनिया

    किताबों की दुनिया, ज्ञान की दुनिया है। अनुभवों की दुनिया है। ऐसी दुनिया जहां कल्पनाएं हैं, सपने हैं और उन सपनों को साकार करने के रास्ते भी हैं। ऐसी दुनिया जहां जीवन है, संबंध है, प्रेरक-रोचक किस्से हैं, इतिहास है, साहित्य है, संगीत है। खुशनशीब हैं वे लोग जिनके हाथों में किताबें हैं। जो पढ़-लिख सकते हैं। 


PC: Facebook wall of Rajkamal Prakashan Samuh


किताबें हमारे विचारों को, कल्पनाओं को, अनुभवों को, सोचने-समझने के दायरे को नया आकाश देती हैं। नया विस्तार देती हैं। एक लेखक अपने ज्ञान और अनुभव को किताब के रूप में सामने लाता है। जिन किताबों को हम दो-तीन दिन में पढ़ लेते हैं, उनको लिखने में दो-तीन साल, कभी-कभी पांच-दस साल लग जाते हैं। किताबों में जो ज्ञान है वह कभी नष्ट नहीं होता। समय के साथ-साथ, अपने पाठकों के माध्यम से उसका भी विस्तार होता जाता है। 
किताबों व लेखकों के महत्व को बताने के लिए साथ ही काॅपीराइट के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रत्येक वर्ष 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं काॅपीराइट दिवस मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष एक थीम निर्धारित की जाती है। वर्ष 2023 की थीम है- स्वदेशी भाषाएं। किताबों का प्रचार करने, 
समय के साथ किताबों के रूप व स्वरूप में परिवर्तन आए हैं। ये परिवर्तन नई सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के कारण हैं। वर्तमान में प्रकाशित किताबों के साथ ही ई-बुक यानि इलेक्ट्राॅनिक किताबों का चलन बढ़ गया है। आप अपने फोन या टैबलेट के माध्यम से किताबों को पढ़ सकते हैं। 
समय के साथ-साथ पुस्तकालयों में भी आमूलचूक परिवर्तन देखे जा सकते हैं। अब ई-लाइब्रेरी, डिजिटल,  ऑनलाइन लाइब्रेरी की भी सुविधा उपलब्ध है। इंटरनेट आविष्कार के बाद निर्मित वैश्विक ग्राम में आप दुनिया के किसी भी लाइब्रेरी की सदस्यता ले सकते हैं और किताबें पढ़ सकते हैं। समय सीमा की भी कोई समस्या नहीं है। आप जब चाहें किताबें उपलब्ध हैं। सातों दिन, चैबिसों घंटे। 
पुस्तकों व लेखकों के बारे में प्रचार-प्रसार करने में पुस्तक मेलों का भी महत्व कम नहीं हैं। राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले इन पुस्तक मेलों में केेवल किताबों पर ही बातें नहीं होतीं। लेखकों, प्रकाशकों से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर भी सभा-संगोष्ठी होती है। यह एक अवसर होता है जब पाठक अपने पसंदीदा लेखक से रूबरू होकर, अपने प्रश्न पूछे सकता है। गुफ्तगू कर सकता है। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा विभिन्न देश के विभिन्न शहरों में पुस्तक मेलों का आयोजन किया जाता है। साथ ही विभिन्न प्रकाशकों, संगठनों, समूहों द्वारा भी ऐसे प्रयास किये जाते हैं। 
मौलिक ज्ञान का अपना महत्व है। मौलिक रचनाएं पाठकों को बहुत प्रभावित करती हैं। रचनाओं की मौलिकता व लेखकों के अधिकारों को संरक्षित करने के उद्देश्य से काॅपीराइट एक्ट को लागू किया गया। कोई भी किताब या रचना पर उसके लेखक का अधिकार होता है। उसने बड़ी तपस्या से किताब लिखी होती है। ऐसे में लेखक के अधिकारों के संरक्षण के लिए काॅपीराइट एक्ट एक महत्वपूर्ण जरिया है। 
हमें रोज कुछ नया पढ़ना चाहिए और कुछ नया लिखना चाहिए। इससे न सिर्फ हमारी रचनात्मकता बरकरार रहती है बल्कि हम दुनिया को कुछ नया दे रहे होते हैं। विश्व पुस्तक एवं काॅपीराइट दिवस पर यही कामना है कि किताबों को उनके पाठक मिलें। लेखकों-प्रकाशकों का उत्साह बना रहे और वे नित नया ज्ञान सृजित करते रहें। ज्ञान की परंपरा कायम रहे। 
   -डॉ. गुरु सरन लाल 

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

Concept of Global Village/ वैश्विक ग्राम की अवधारणा

Concept of Global Village/ वैश्विक ग्राम की अवधारणा 

                                                                                            -डॉ. गुरु सरन लाल 

    इतिहास गवाह है कि जब किसी वैज्ञानिक या महापुरूष ने कोई नई बात कही है तब उसे समाज की आलोचना का शिकार होना पड़ा है। हवाई जहाज का आविष्कार करने वाले राइट ब्रदर्स हों, गति का नियम देने वाले न्यूटन हों, बल्व का आविष्कार करने वाले एडिशन हों, ऊर्जा का फार्मूला देने वाले अलबर्ट आइंस्टीन हों, या सुकरात हों।  ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे। सुप्रसिद्ध संचारशास्त्री मार्शल मैकलुहान को भी अपने ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा के कारण काफी आलोचना झेलनी पड़ी। लेकिन तीन-चार दशक बाद उनकी यह अवधारणा/परिकल्पना बिल्कुल सही साबित हुई। 

                                                                                                      P.C.: Google


        संचारशास्त्री मार्शल मैकलुहान ने 1960 के दशक में वैश्विक ग्राम की अवधारणा दी थी। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग मीडिया’ में इसका उल्लेख किया है। वे कनाडा के रहने वाले थे। मूल रूप से हंगरी भाषा के कवि थे। उन्होंने जनसंचार का अध्ययन किया और बड़े संचारशास्त्री बने। उनकी दूरदर्शिता का एक प्रमाण है ग्लोबल विलेज की उनकी अवधारणा। इस अवधारणा के अनुसार आने वाले समय में पूरे विश्व में सूचना एवं जनसंचार माध्यमों का ऐसा संजाल होगा जिसकी सहायता से दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक कोई सूचना पहुंचाना बहुत आसान हो जाएगा। 

1960 के दशक में पूरे विश्व में रेडियो और टेलीविजन अत्याधुनिक संचार माध्यम के रूप में उपलब्ध थे। भारत में प्रिंट मीडिया और परंपरागत माध्यम या फोक मीडिया ही स्थायी रूप से जनसंचार के माध्यम थे। आकाशवाणी उस समय था लेकिन उसके लिए अभी कोई निश्चित प्रसारण नीति नहीं बन पाई थी। टेलीविजन का प्रसारण 1959 में शुरू ही हुआ था। रेडियो और टेलीविजन के लिए चंदा कमेटी और वर्गिज कमेटी के गठन और उनकी अनुशंसाओं का दौर था। 

ऐसे समय में ग्लोबल विलेज की अवधारणा का विरोध तो होना ही था। लेकिन जब इंटरनेट का आविष्कार हुआ और सूचना व संचार प्रौद्योगिकी का विकास हुआ तक मैकलुहान की अवधारणा सच साबित होती दिखी। वैश्वीकरण के बाद जब इंटरनेट और स्मार्टफोन तक आम लोगों की पहुंच हुई तो यह अवधारणा बिल्कुल सच साबित हुई। सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के वर्तमान दौर की कल्पना उस समय मार्शल मैकलुहान ने की थी। आज पूरा विश्व एक वैश्विक ग्राम में तब्दील हो गया है। डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया इसके साकार रूप हैं। आज सूचनाएं मात्र एक क्लिक पर पूरे विश्व में भेजी जा सकती हैं। 

मार्शल मैकलुहान ने एक और अवधारणा दी थी- मीडियम इज द मैसेज यानि माध्यम ही संदेश है। उन्होंने टेलीविजन के दर्शकों पर अध्ययन किया और पाया कि लोगों के पास यदि समय है तो वे टेलीविजन देखते हैं। टेलीविजन पर कौन-सा कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है इससे उनको ज्यादा इत्तेफाक नहीं होता। उन्होंने पाया कि जब दर्शक टेलीविजन देखता है तो उस दौरान प्रसारित होने वाली अन्तर्वस्तु से वह अवगत होता है और प्रभावित होता है। इसी आधार पर उन्होंने यह अवधारणा दी कि माध्यम ही संदेश है। 

                    -डॉ. गुरु सरन लाल 



रविवार, 16 अप्रैल 2023

Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 15.04.2023

 Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 15.04.2023



लेख

लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देती नागरिक पत्रकारिता

-डाॅ. गुरु सरन लाल

    किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिक महत्वपूर्ण होते हैं। प्रत्येक नागरिक बराबर होता है और सारे नियम-कायदे सभी पर समान रूप से लागू होते हैं। भारत में मीडिया या पत्रकारिता को वही वाक् एवं अभिव्यक्ति का अधिकार प्राप्त है जो आम लोगों को है। सूचनाओं या समाचारों के प्रकाशन-प्रसारण और वितरण का अधिकार आम लोगों को भी वही है जो मीडिया को है। एक समय था जब ‘न्यूज-ब्रेक’ करना केवल मुख्यधारा की मीडिया का काम था। आम लोगों को इसका पता तब चलता था जब समाचार प्रकाशित या प्रसारित हो जाते थे। लेकिन न्यू मीडिया या डिजिटल मीडिया के प्रादुर्भाव से नागरिक पत्रकारिता को बल मिला है। अब मुख्यधारा के समानांतर ही एक वैकल्पिक मीडिया कार्य कर रहा है जिसे नागरिक पत्रकारिता कहा जाता है। अब सूचनाएं वैकल्पिक मीडिया द्वारा भी ‘न्यूज-ब्रेक’ की जाती हैं। नागरिक पत्रकारिता कोई नया शब्द नहीं है। समाचार-पत्रों में ‘संपादक के नाम पत्र’ के प्रकाशन से इसकी शुरूआत माना जाता है। 
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की लोकतंत्र की परिभाषा से नागरिक पत्रकारिता को समझा जा सकता है। उनके अनुसार लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए जनता द्वारा शासन है। इसी तरह नागरिक पत्रकारिता, नागरिकों द्वारा नागरिकों के लिए नागरिकों की पत्रकारिता कहा जा सकता है। स्माॅर्टफोन के उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या और इंटरनेट की उपलब्धता ने नागरिक पत्रकारिता को और मजबूत बना दिया है। वेबपोर्टल, ब्लाॅग, यूट्यूब चैनल, सोशल नेटवकिंग साइट्स जैसे ट्वीटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम इत्यादि पर विभिन्न विषयों व मुद्दों से संबंधित लगातार कंटेट उपलब्ध हो रहे हैं। दूरदराज क्षेत्रों की खबरें भी मिल रही हैं जहां आमतौर पर मुख्यधारा की मीडिया की पहुंच नहीं होती। पहुंच होती भी है तो लाभ या विज्ञापन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं होती है। डिजिटल मीडिया ने शिक्षित या अशिक्षित, सामान्य व्यक्ति या दिव्यांग का भेद खत्म कर दिया है क्योंकि इसकी अन्तर्वस्तु लिखे गये शब्दों, फोटोग्राफ, दृश्य-श्रव्य, एनिमेशन, काॅर्टून इत्यादि रूपों में उपलब्ध है जिसे आसानी से समझा जा सकता है। नागरिक पत्रकारिता निचले तबके और हासिए के लोगों की आवाज बनकर उभरा है। 
नागरिक पत्रकारिता या वैकल्पिक मीडिया में समाचारों का फाॅलोअप लगातार होता रहता है। मुख्यधारा की मीडिया समाचारों को प्रकाशित प्रसारित कर फाॅलोअप कम ही लिया जाता है या सभी खबरों पर नहीं लिया जाता। लेकिन नागरिक पत्रकारिता उन मुद्दों व विषयों पर फाॅलोअप उपलब्ध कराया जाता है। विभिन्न नागरिक सुविधाओं से संबंधित समस्याओं को लोग डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया के माध्यम से उठाते हैं और उनका समुचित समाधान भी मिल रहा है। कहीं सड़क धंस गई है या नहीं बन पाई है, नाला, पुलिया, पानी निकासी की समस्या, गली-मोहल्ले में गुंडागर्दी, अराजकतत्व, भ्रष्टाचार, विभिन्न प्रमाण-पत्रों को बनाने में बरती जा रही कोताही इत्यादि न जाने कितने ही मुद्दे हैं जिन्हें नागरिक पत्रकारिता के माध्यम से संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के संज्ञान में लाया जा रहा है और समुचित कार्यवाही भी हो रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा मिल रहा है। 
एक ओर जहां नागरिक पत्रकारिता की तमाम खूबियां हैं वहीं इसकी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। अपूर्ण या अपुष्ट समाचारों या खबरों को भी प्रकाशित प्रसारित कर दिया जाता है। फेक न्यूज की भी चुनौतियां हैं। कभी-कभी अफवाहों, प्रोपेगेण्डा का भी शिकार हो जाता है। इसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहते हैं। किसी भी माध्यम की अपनी खूबियां और खामियां होती हैं। नागरिक पत्रकारिता एक ओर जहां नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति का मंच प्रदान करता है वहीं नागरिकों को भी इसका उपयोग बहुत सावधानी, सतर्कता और समझदारी से करने की जरूरत है।

लेखक का परिचयः 
डाॅ. गुरु सरन लाल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय , भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)

Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 04.04.2023

 Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 04.04.2023



लेख

मीडिया एवं सूचना साक्षरताः आवश्यकता एवं महत्व


मीडिया साक्षरता का अर्थ है मीडिया के विभिन्न रूपों और उसकी अन्तर्वस्तु से परिचित होना। मीडिया की अन्तर्वस्तु के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को पहचानना और समझ के साथ उसका उपयोग करना। वर्तमान सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जब सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। सूचनाओं का प्रबंध एक मुश्किल कार्य हो चला है। ऐसे में फेक न्यू, अफवाह, प्रोपेगेण्डा इत्यादि की पहचान कर सही समाचार व जानकारी को प्राप्त करना एक कला होने के साथ-साथ एक जागरूक नागरिक होने की पहचान है। यह बड़ी जिम्मेदारी है कि फेक न्यूज, बिना तथ्य की सूचनाओं को फैलने से रोका जाए और समाज में सद्भाव, सहचर्य का माहौल बना रहे, ऐसे प्रयास किये जाएं।
मीडिया एवं सूचना साक्षरता के कई प्रकार हैं जैसे- मीडिया लिटरेसी, सूचना लिटरेसी, फिल्म, टेलीविजन, प्रिंट, ऑडियो-विजुअल लिटरेसी, विज्ञापन, इंटरनेट, कल्चरल, फाइनेंशियल लिटरेसी इत्यादि। अर्थात् हमारे जीवन में उपयोग में आने वाले सभी माध्यमों के बारे में सही जानकारी रखना। जब हम समाचार-पत्र या पत्रिका पढ़ें, कोई फिल्म देखें, रेडियो सुनें या टीवी देखें, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर कोई सामग्री देखें तो हम क्या कहा जा रहा है उसे विश्लेषणात्मक तरीके से समझ सकें। ‘रीड बिटवीन द लाइन’ अवधारणा की आज बहुत ज्यादा जरूरत है। यह मीडिया व सूचना साक्षरता से संभव है।
मीडिया व सूचना साक्षरता ऐसी क्षमता है जिसमें हम सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, उनका विश्लेषण, मूल्याकन करते हैं। सही और गलत सूचना व समाचार की समझ विकसित होती है। न्यूज और फेक न्यूज का अन्तर पता चलता है। समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, फिल्में, इंटरनेट, सोशल मीडिया इत्यादि के बारे में एक बेहतर समझ बनती है। एक आलोचनात्मक सोच विकसित होती है। एक तार्किकता की समझ आती है। विभिन्न पाइन्ट ऑफ व्यू को समझने में मदद मिलती है।
मीडिया और सूचना साक्षरता से हम न केवल एक बेहतर पाठक, श्रोता, दर्शक और यूजर बनते हैं बल्कि एक अच्छे उपभोक्ता बनते हैं। उत्पादों के चयन में आसानी होती है। एक वाजिब तर्क होता है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग बेहतर जीवन जीने में कर पाते हैं। साथ ही सतत् विकास के लिए भी मीडिया और सूचना साक्षरता का होना बहुत जरूरी है।
द्वितीय विश्व युद्व के समय प्रोपेगेण्डा शब्द अस्तित्व में आया। उस समय आज की अपेक्षा संचार के माध्यम बहुत कम थे और गति बहुत धीमी थी। आज सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जहां सूचनाओं को मात्र एक क्लिक पर हजारों-लाखों लोगों तक बहुत तीव्र गति से पहुंचाया जा सकता है ऐसे में सूचनाओं के चयन और प्रस्तुतिकरण में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। साथ ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को मीडिया व सूचना साक्षर होना अनिवार्य हो गया है। आज लड़ाई सूचनाओं की है। आज सूचना साम्राज्यवाद का युग है। जिस देश के पास जितनी अधिक सूचनाएं वह उतना ही समृद्ध देश माना जाता है।
संचार शास्त्री मार्शल मैकलुहान ने ‘माध्यम की संदेश है’ की अवधारणा दी थी। उन्होंने टेलीविजन के दर्शकों पर अपना शोध किया और पाया कि लोगों के पास यदि समय है तो वे टेलीविजन देखेंगे। उस समय टीवी पर कौन सा कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है, इससे ज्यादा मतलब नहीं होता। इस अध्ययन के समय टेलीविजन अत्याधुनिक संचार माध्यम था। मार्शल मैकलुहान की अवधारणा वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक है। अत्याधुनिक माध्यम डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। आज जब एक बड़ी ऑडियंस डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया पर शिफ्ट हो रही है, तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया अन्तर्वस्तु भी वहीं पर ज्यादा मिलेगी। ऐसे समय में मीडिया व सूचना साक्षरता का महत्वपूर्ण बढ़ जाता है।
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लेखकः डाॅ. गुरु सरन लाल
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), मोबाइल नं. 9425542795, ई-मेलः gurusaranlal@gmail.com


Article published in Pahat Newspaper on 03.04.2023

 


Article published in Pahat Newspaper on 03.04.2023
लेख

मीडिया एवं सूचना साक्षरताः आवश्यकता एवं महत्व


मीडिया साक्षरता का अर्थ है मीडिया के विभिन्न रूपों और उसकी अन्तर्वस्तु से परिचित होना। मीडिया की अन्तर्वस्तु के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को पहचानना और समझ के साथ उसका उपयोग करना। वर्तमान सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जब सूचनाओं का विस्फोट हो रहा है। सूचनाओं का प्रबंध एक मुश्किल कार्य हो चला है। ऐसे में फेक न्यू, अफवाह, प्रोपेगेण्डा इत्यादि की पहचान कर सही समाचार व जानकारी को प्राप्त करना एक कला होने के साथ-साथ एक जागरूक नागरिक होने की पहचान है। यह बड़ी जिम्मेदारी है कि फेक न्यूज, बिना तथ्य की सूचनाओं को फैलने से रोका जाए और समाज में सद्भाव, सहचर्य का माहौल बना रहे, ऐसे प्रयास किये जाएं।
मीडिया एवं सूचना साक्षरता के कई प्रकार हैं जैसे- मीडिया लिटरेसी, सूचना लिटरेसी, फिल्म, टेलीविजन, प्रिंट, ऑडियो-विजुअल लिटरेसी, विज्ञापन, इंटरनेट, कल्चरल, फाइनेंशियल लिटरेसी इत्यादि। अर्थात् हमारे जीवन में उपयोग में आने वाले सभी माध्यमों के बारे में सही जानकारी रखना। जब हम समाचार-पत्र या पत्रिका पढ़ें, कोई फिल्म देखें, रेडियो सुनें या टीवी देखें, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर कोई सामग्री देखें तो हम क्या कहा जा रहा है उसे विश्लेषणात्मक तरीके से समझ सकें। ‘रीड बिटवीन द लाइन’ अवधारणा की आज बहुत ज्यादा जरूरत है। यह मीडिया व सूचना साक्षरता से संभव है।
मीडिया व सूचना साक्षरता ऐसी क्षमता है जिसमें हम सूचनाओं को प्राप्त करते हैं, उनका विश्लेषण, मूल्याकन करते हैं। सही और गलत सूचना व समाचार की समझ विकसित होती है। न्यूज और फेक न्यूज का अन्तर पता चलता है। समाचार-पत्र, पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, फिल्में, इंटरनेट, सोशल मीडिया इत्यादि के बारे में एक बेहतर समझ बनती है। एक आलोचनात्मक सोच विकसित होती है। एक तार्किकता की समझ आती है। विभिन्न पाइन्ट ऑफ व्यू को समझने में मदद मिलती है।
मीडिया और सूचना साक्षरता से हम न केवल एक बेहतर पाठक, श्रोता, दर्शक और यूजर बनते हैं बल्कि एक अच्छे उपभोक्ता बनते हैं। उत्पादों के चयन में आसानी होती है। एक वाजिब तर्क होता है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग बेहतर जीवन जीने में कर पाते हैं। साथ ही सतत् विकास के लिए भी मीडिया और सूचना साक्षरता का होना बहुत जरूरी है।
द्वितीय विश्व युद्व के समय प्रोपेगेण्डा शब्द अस्तित्व में आया। उस समय आज की अपेक्षा संचार के माध्यम बहुत कम थे और गति बहुत धीमी थी। आज सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के युग में जहां सूचनाओं को मात्र एक क्लिक पर हजारों-लाखों लोगों तक बहुत तीव्र गति से पहुंचाया जा सकता है ऐसे में सूचनाओं के चयन और प्रस्तुतिकरण में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। साथ ही पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को मीडिया व सूचना साक्षर होना अनिवार्य हो गया है। आज लड़ाई सूचनाओं की है। आज सूचना साम्राज्यवाद का युग है। जिस देश के पास जितनी अधिक सूचनाएं वह उतना ही समृद्ध देश माना जाता है।
संचार शास्त्री मार्शल मैकलुहान ने ‘माध्यम की संदेश है’ की अवधारणा दी थी। उन्होंने टेलीविजन के दर्शकों पर अपना शोध किया और पाया कि लोगों के पास यदि समय है तो वे टेलीविजन देखेंगे। उस समय टीवी पर कौन सा कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है, इससे ज्यादा मतलब नहीं होता। इस अध्ययन के समय टेलीविजन अत्याधुनिक संचार माध्यम था। मार्शल मैकलुहान की अवधारणा वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक है। अत्याधुनिक माध्यम डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। आज जब एक बड़ी ऑडियंस डिजिटल मीडिया या सोशल मीडिया पर शिफ्ट हो रही है, तो ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया अन्तर्वस्तु भी वहीं पर ज्यादा मिलेगी। ऐसे समय में मीडिया व सूचना साक्षरता का महत्वपूर्ण बढ़ जाता है।
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लेखकः डाॅ. गुरु सरन लाल
एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय, भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), मोबाइल नं. 9425542795, ई-मेलः gurusaranlal@gmail.com

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयंती पर विशेष लेख

लेख

   सामाजिक न्याय और सामाजिक बराबरी के पक्षधर डाॅ. अंबेडकर


भारतरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर आप सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। आज कृतज्ञ राष्ट्र उनकी 132वीं जयंती मना रहा है। बाबा साहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है। बहुत सारे पक्ष हैं, बहुत सारे पहलू हैं। उन्हें हम उच्च कोटि के अर्थशास्त्री, कानूनविद, संविधान निर्माता, ध्येय निष्ठ राजनेता और सामाजिक क्रांति एवं समरसता के अग्रदूत के रूप में जानते हैं। 

    

    महापुरूषों का जीवन अपने आप में आदर्श होता है, अनुकरणीय होता है। बाबा साहब ऐसे महान कर्मयोगी थे जिन्होंने अपनी तपस्या से, अपने बल पर दुनिया में वह मुकाम हासिल किया जो किसी बिरले को हासिल होता है। जिस समय भारतीय संविधान के निर्माण की बात सामने आई तो संविधान सभा का गठन किया गया। पूरी संविधान सभा में बाबा साहब जितना पढ़ा-लिखा कोई नहीं था। दलित समाज के लिए इससे बड़ी गौरव की बात और कोई नहीं थी। जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना। वे सामाजिक न्याय और सामाजिक बराबरी के पक्षधर थे। 

Dr. B.R. Ambedkar
    

बाबासाहब ने अस्पृश्यता का दंश झेला था। यह उन्हें अन्दर से झकझोर दिया था। उस समय का दलित-आदिवासी और पिछड़े समाज पर जो अत्याचार हो रहे थे, जातिवाद, छुआछूत का जो पूरा वातावरण था, वह घुटन वाला था। बाबा साहब ने सभी को समान अधिकार देकर उससे निजात दिलाई। आरक्षण का प्रावधान किया गया जिससे दलित आदिवासी और पिछड़े तबके के लोग आगे आ सकें। हासिए से निकलकर मुख्यधारा में आ सकें। 

उन्होंने एक सूत्र वाक्य दिया- शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। उन्होंने कहा कि जिसे दुखों से मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा, और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा, क्योंकि ज्ञान के बना लड़ने गए तो हार निश्चित है। उनका मानना था कि शिक्षा शेरनी का वह दूध है जिसे पीने वाला दहाड़ने लगता है। उन्होंने संगठित रहकर संघर्ष करने की सीख दी थी। बाबा साहब ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से भारतीय महिलाओं की जिन्दगी को संवार दिया है। उनका उद्धार किया। महिलाओं की दशा सुधारने में मील का पत्थर साबित हुआ। इसका लाभ सभी महिलाओं को मिला चाहे वह किसी भी जाति से आती हों। सभी भारतीय महिलाएं उनकी हमेशा ऋणी रहेंगी। 

बाबा साहेब का पूरा जीवन एक आदर्श के रूप में हमारे सामने है। हमारा कर्तव्य है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलते चले जाएं और उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतारें। 

                                                             -डॉ. गुरु सरन लाल , 9425542795, gurusaranlal@gmail.com

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

पहला सुख निरोगी काया...


विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष                                                                                             07.04.2023

                            पहला सुख निरोगी काया...

जीवन में अच्छे स्वास्थ्य का बहुत महत्व है। यदि हमारे पास दुनिया भर की सारी सुख सुविधाएं हों और हमारा स्वास्थ्य अच्छा ना हो, तो उन सारी सुख सुविधाओं का हम आनंद नहीं ले सकते हैं। उनका कोई मतलब नहीं है। इसलिए कहा गया है कि ‘पहला सुख निरोगी काया’। जब हम स्वस्थ रहते हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। हम अच्छे से अपना कार्य कर पाते हैं। आपने यह कहावत भी सुनी होगी कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। यह बिल्कुल सटीक बात है कि अस्वस्थता की स्थिति में हमारा मस्तिष्क सही से कार्य नहीं करता और मन में नकारात्मक विचार घेरे रहते हैं। वहीं जब हम स्वस्थ रहते हैं तो हमारा मस्तिष्क स्वस्थ रहता है और हम सकारात्मक विचारों से भरे रहते हैं। 

स्वास्थ्य के महत्व को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल से प्रत्येक वर्ष 07 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष 2023 की थीम ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ रखा गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1977 में वर्ष 2000 तक सबको स्वास्थ्य उपलब्ध्ल कराने का संकल्प लिया था। इसके बाद 2000 से 2015 तक मिलेनियम डवलपमेंट गोल के तहत भी प्रयास किये गये और अब 2030 तक सतत विकास के लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं। 

    सन् 1983 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को पारित करके सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पाने का संकल्प लिया था लेकिन राजनीति इच्छाशक्ति के बिना यह संभव नहीं है। जब स्वास्थ्य सुविधाएं कंपनियों की कमाई का जरिया हों तब सबको स्वास्थ्य का सपना कैसे पूरा होगा? यह एक गंभीर विषय है। 

हाल ही में राजस्थान सरकार ने स्वास्थ्य का अधिकार (आर.टी.एच.) लागू किया है। इसके तहत समस्त इलाज निःशुल्क किया जाएगा। यह एक स्वागत योग्य कदम है। बाकी राज्य सरकारों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। 

बहुत सारे आकड़े हैं, बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारे मुद्दे हैं। देखने वाली बात ये है कि आजादी के 75 सालों के बाद भी पूरी जनसंख्या को साफ जल, शुद्ध वायु नहीं मिल पा रही है। अशुद्ध जल और अशुद्ध वायु अनेक संक्रामक बिमारियों के फैलने के मुख्य कारक हैं। बहुत सारी बिमारियां ऐसी भी हैं जो अनियमित, अनियंत्रित जीवन शैली के कारण पैदा हुई हैं। इन्हें हम अपने जीवन शैली को सुधारकर स्वस्थ रखकर इन पर नियंत्रण रखा जा सकता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, वैज्ञानिक, डाॅक्टर, विशेषज्ञ इत्यादि अपना कार्य बखूबी कर रहे हैं। विज्ञान संचार और स्वास्थ्य संचार के माध्यम से मीडिया भी स्वास्थ्य जागरूकता के प्रति अपनी भूमिका निभा रहा है। इसके साथ ही हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। स्वयं जागरूक होना होगा। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जानकारी विभिन्न बिमारियों से बचा सकती है। कोविड-19 ने पूरे मानव मात्र को और विश्व की स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावित किया है। विश्व पहले से अधिक सतर्क हुआ है। हम निश्चिततौर पर अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क और जागरूक हुए हैं लेकिन यह सतर्कता और जागरूकता लगातार बनी रहनी चाहिए। खुद भी स्वस्थ रहें औरों को भी स्वस्थ रहने में मदद करें। 

लेखक का परिचयः 

डाॅ. गुरु सरन लाल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय , भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), 9131586112