लेख
सोमवार, 24 अप्रैल 2023
Article on Public Relations day published in Bharat Bhaskar 22.04.2023
रविवार, 23 अप्रैल 2023
किताबों की दुनिया
किताबों की दुनिया, ज्ञान की दुनिया है। अनुभवों की दुनिया है। ऐसी दुनिया जहां कल्पनाएं हैं, सपने हैं और उन सपनों को साकार करने के रास्ते भी हैं। ऐसी दुनिया जहां जीवन है, संबंध है, प्रेरक-रोचक किस्से हैं, इतिहास है, साहित्य है, संगीत है। खुशनशीब हैं वे लोग जिनके हाथों में किताबें हैं। जो पढ़-लिख सकते हैं।
सोमवार, 17 अप्रैल 2023
Concept of Global Village/ वैश्विक ग्राम की अवधारणा
Concept of Global Village/ वैश्विक ग्राम की अवधारणा
-डॉ. गुरु सरन लाल
इतिहास गवाह है कि जब किसी वैज्ञानिक या महापुरूष ने कोई नई बात कही है तब उसे समाज की आलोचना का शिकार होना पड़ा है। हवाई जहाज का आविष्कार करने वाले राइट ब्रदर्स हों, गति का नियम देने वाले न्यूटन हों, बल्व का आविष्कार करने वाले एडिशन हों, ऊर्जा का फार्मूला देने वाले अलबर्ट आइंस्टीन हों, या सुकरात हों। ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे। सुप्रसिद्ध संचारशास्त्री मार्शल मैकलुहान को भी अपने ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा के कारण काफी आलोचना झेलनी पड़ी। लेकिन तीन-चार दशक बाद उनकी यह अवधारणा/परिकल्पना बिल्कुल सही साबित हुई।
P.C.: Googleसंचारशास्त्री मार्शल मैकलुहान ने 1960 के दशक में वैश्विक ग्राम की अवधारणा दी थी। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग मीडिया’ में इसका उल्लेख किया है। वे कनाडा के रहने वाले थे। मूल रूप से हंगरी भाषा के कवि थे। उन्होंने जनसंचार का अध्ययन किया और बड़े संचारशास्त्री बने। उनकी दूरदर्शिता का एक प्रमाण है ग्लोबल विलेज की उनकी अवधारणा। इस अवधारणा के अनुसार आने वाले समय में पूरे विश्व में सूचना एवं जनसंचार माध्यमों का ऐसा संजाल होगा जिसकी सहायता से दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक कोई सूचना पहुंचाना बहुत आसान हो जाएगा।
1960 के दशक में पूरे विश्व में रेडियो और टेलीविजन अत्याधुनिक संचार माध्यम के रूप में उपलब्ध थे। भारत में प्रिंट मीडिया और परंपरागत माध्यम या फोक मीडिया ही स्थायी रूप से जनसंचार के माध्यम थे। आकाशवाणी उस समय था लेकिन उसके लिए अभी कोई निश्चित प्रसारण नीति नहीं बन पाई थी। टेलीविजन का प्रसारण 1959 में शुरू ही हुआ था। रेडियो और टेलीविजन के लिए चंदा कमेटी और वर्गिज कमेटी के गठन और उनकी अनुशंसाओं का दौर था।
ऐसे समय में ग्लोबल विलेज की अवधारणा का विरोध तो होना ही था। लेकिन जब इंटरनेट का आविष्कार हुआ और सूचना व संचार प्रौद्योगिकी का विकास हुआ तक मैकलुहान की अवधारणा सच साबित होती दिखी। वैश्वीकरण के बाद जब इंटरनेट और स्मार्टफोन तक आम लोगों की पहुंच हुई तो यह अवधारणा बिल्कुल सच साबित हुई। सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के वर्तमान दौर की कल्पना उस समय मार्शल मैकलुहान ने की थी। आज पूरा विश्व एक वैश्विक ग्राम में तब्दील हो गया है। डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया इसके साकार रूप हैं। आज सूचनाएं मात्र एक क्लिक पर पूरे विश्व में भेजी जा सकती हैं।
मार्शल मैकलुहान ने एक और अवधारणा दी थी- मीडियम इज द मैसेज यानि माध्यम ही संदेश है। उन्होंने टेलीविजन के दर्शकों पर अध्ययन किया और पाया कि लोगों के पास यदि समय है तो वे टेलीविजन देखते हैं। टेलीविजन पर कौन-सा कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है इससे उनको ज्यादा इत्तेफाक नहीं होता। उन्होंने पाया कि जब दर्शक टेलीविजन देखता है तो उस दौरान प्रसारित होने वाली अन्तर्वस्तु से वह अवगत होता है और प्रभावित होता है। इसी आधार पर उन्होंने यह अवधारणा दी कि माध्यम ही संदेश है।
-डॉ. गुरु सरन लाल
रविवार, 16 अप्रैल 2023
Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 15.04.2023
Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 15.04.2023
Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 04.04.2023
Article published in Bharat Bhaskar Newspaper on 04.04.2023
Article published in Pahat Newspaper on 03.04.2023
शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयंती पर विशेष लेख
लेख
सामाजिक न्याय और सामाजिक बराबरी के पक्षधर डाॅ. अंबेडकर
भारतरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर आप सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। आज कृतज्ञ राष्ट्र उनकी 132वीं जयंती मना रहा है। बाबा साहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है। बहुत सारे पक्ष हैं, बहुत सारे पहलू हैं। उन्हें हम उच्च कोटि के अर्थशास्त्री, कानूनविद, संविधान निर्माता, ध्येय निष्ठ राजनेता और सामाजिक क्रांति एवं समरसता के अग्रदूत के रूप में जानते हैं।
महापुरूषों का जीवन अपने आप में आदर्श होता है, अनुकरणीय होता है। बाबा साहब ऐसे महान कर्मयोगी थे जिन्होंने अपनी तपस्या से, अपने बल पर दुनिया में वह मुकाम हासिल किया जो किसी बिरले को हासिल होता है। जिस समय भारतीय संविधान के निर्माण की बात सामने आई तो संविधान सभा का गठन किया गया। पूरी संविधान सभा में बाबा साहब जितना पढ़ा-लिखा कोई नहीं था। दलित समाज के लिए इससे बड़ी गौरव की बात और कोई नहीं थी। जब संविधान बनकर तैयार हुआ तो उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया ने माना। वे सामाजिक न्याय और सामाजिक बराबरी के पक्षधर थे।
बाबासाहब ने अस्पृश्यता का दंश झेला था। यह उन्हें अन्दर से झकझोर दिया था। उस समय का दलित-आदिवासी और पिछड़े समाज पर जो अत्याचार हो रहे थे, जातिवाद, छुआछूत का जो पूरा वातावरण था, वह घुटन वाला था। बाबा साहब ने सभी को समान अधिकार देकर उससे निजात दिलाई। आरक्षण का प्रावधान किया गया जिससे दलित आदिवासी और पिछड़े तबके के लोग आगे आ सकें। हासिए से निकलकर मुख्यधारा में आ सकें।
उन्होंने एक सूत्र वाक्य दिया- शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। उन्होंने कहा कि जिसे दुखों से मुक्ति चाहिए उसे लड़ना होगा, और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा, क्योंकि ज्ञान के बना लड़ने गए तो हार निश्चित है। उनका मानना था कि शिक्षा शेरनी का वह दूध है जिसे पीने वाला दहाड़ने लगता है। उन्होंने संगठित रहकर संघर्ष करने की सीख दी थी। बाबा साहब ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से भारतीय महिलाओं की जिन्दगी को संवार दिया है। उनका उद्धार किया। महिलाओं की दशा सुधारने में मील का पत्थर साबित हुआ। इसका लाभ सभी महिलाओं को मिला चाहे वह किसी भी जाति से आती हों। सभी भारतीय महिलाएं उनकी हमेशा ऋणी रहेंगी।
बाबा साहेब का पूरा जीवन एक आदर्श के रूप में हमारे सामने है। हमारा कर्तव्य है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलते चले जाएं और उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतारें।
शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023
पहला सुख निरोगी काया...
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष 07.04.2023
पहला सुख निरोगी काया...
जीवन में अच्छे स्वास्थ्य का बहुत महत्व है। यदि हमारे पास दुनिया भर की सारी सुख सुविधाएं हों और हमारा स्वास्थ्य अच्छा ना हो, तो उन सारी सुख सुविधाओं का हम आनंद नहीं ले सकते हैं। उनका कोई मतलब नहीं है। इसलिए कहा गया है कि ‘पहला सुख निरोगी काया’। जब हम स्वस्थ रहते हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। हम अच्छे से अपना कार्य कर पाते हैं। आपने यह कहावत भी सुनी होगी कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। यह बिल्कुल सटीक बात है कि अस्वस्थता की स्थिति में हमारा मस्तिष्क सही से कार्य नहीं करता और मन में नकारात्मक विचार घेरे रहते हैं। वहीं जब हम स्वस्थ रहते हैं तो हमारा मस्तिष्क स्वस्थ रहता है और हम सकारात्मक विचारों से भरे रहते हैं।
स्वास्थ्य के महत्व को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल से प्रत्येक वर्ष 07 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष 2023 की थीम ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ रखा गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1977 में वर्ष 2000 तक सबको स्वास्थ्य उपलब्ध्ल कराने का संकल्प लिया था। इसके बाद 2000 से 2015 तक मिलेनियम डवलपमेंट गोल के तहत भी प्रयास किये गये और अब 2030 तक सतत विकास के लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं।
सन् 1983 में भारतीय संसद ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को पारित करके सबको स्वास्थ्य के लक्ष्य को पाने का संकल्प लिया था लेकिन राजनीति इच्छाशक्ति के बिना यह संभव नहीं है। जब स्वास्थ्य सुविधाएं कंपनियों की कमाई का जरिया हों तब सबको स्वास्थ्य का सपना कैसे पूरा होगा? यह एक गंभीर विषय है।
हाल ही में राजस्थान सरकार ने स्वास्थ्य का अधिकार (आर.टी.एच.) लागू किया है। इसके तहत समस्त इलाज निःशुल्क किया जाएगा। यह एक स्वागत योग्य कदम है। बाकी राज्य सरकारों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
बहुत सारे आकड़े हैं, बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारे मुद्दे हैं। देखने वाली बात ये है कि आजादी के 75 सालों के बाद भी पूरी जनसंख्या को साफ जल, शुद्ध वायु नहीं मिल पा रही है। अशुद्ध जल और अशुद्ध वायु अनेक संक्रामक बिमारियों के फैलने के मुख्य कारक हैं। बहुत सारी बिमारियां ऐसी भी हैं जो अनियमित, अनियंत्रित जीवन शैली के कारण पैदा हुई हैं। इन्हें हम अपने जीवन शैली को सुधारकर स्वस्थ रखकर इन पर नियंत्रण रखा जा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, वैज्ञानिक, डाॅक्टर, विशेषज्ञ इत्यादि अपना कार्य बखूबी कर रहे हैं। विज्ञान संचार और स्वास्थ्य संचार के माध्यम से मीडिया भी स्वास्थ्य जागरूकता के प्रति अपनी भूमिका निभा रहा है। इसके साथ ही हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। स्वयं जागरूक होना होगा। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जानकारी विभिन्न बिमारियों से बचा सकती है। कोविड-19 ने पूरे मानव मात्र को और विश्व की स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावित किया है। विश्व पहले से अधिक सतर्क हुआ है। हम निश्चिततौर पर अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क और जागरूक हुए हैं लेकिन यह सतर्कता और जागरूकता लगातार बनी रहनी चाहिए। खुद भी स्वस्थ रहें औरों को भी स्वस्थ रहने में मदद करें।
लेखक का परिचयः
डाॅ. गुरु सरन लाल, एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार संकाय , भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.), 9131586112







